तीखी कलम से

मेरे बारे में

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जी हाँ मैं आयुध निर्माणी कानपुर रक्षा मंत्रालय में तकनीकी सेवार्थ कार्यरत हूँ| मूल रूप से मैं ग्राम पैकोलिया थाना, जनपद बस्ती उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ| मेरी पूजनीया माता जी श्रीमती शारदा त्रिपाठी और पूजनीय पिता जी श्री वेद मणि त्रिपाठी सरकारी प्रतिष्ठान में कार्यरत हैं| उनका पूर्ण स्नेह व आशीर्वाद मुझे प्राप्त है|मेरे परिवार में साहित्य सृजन का कार्य पीढ़ियों से होता आ रहा है| बाबा जी स्वर्गीय श्री रामदास त्रिपाठी छंद, दोहा, कवित्त के श्रेष्ठ रचनाकार रहे हैं| ९० वर्ष की अवस्था में भी उन्होंने कई परिष्कृत रचनाएँ समाज को प्रदान की हैं| चाचा जी श्री योगेन्द्र मणि त्रिपाठी एक ख्यातिप्राप्त रचनाकार हैं| उनके छंद गीत मुक्तक व लेख में भावनाओं की अद्भुद अंतरंगता का बोध होता है| पिता जी भी एक शिक्षक होने के साथ साथ चर्चित रचनाकार हैं| माता जी को भी एक कवित्री के रूप में देखता आ रहा हूँ| पूरा परिवार हिन्दी साहित्य से जुड़ा हुआ है|इसी परिवार का एक छोटा सा पौधा हूँ| व्यंग, मुक्तक, छंद, गीत-ग़ज़ल व कहानियां लिखता हूँ| कुछ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होता रहता हूँ| कवि सम्मेलन के अतिरिक्त काव्य व सहित्यिक मंचों पर अपने जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों को आप तक पहँचाने का प्रयास करता रहा हूँ| आपके स्नेह, प्यार का प्रबल आकांक्षी हूँ| विश्वास है आपका प्यार मुझे अवश्य मिलेगा| -नवीन

शनिवार, 29 जुलाई 2017

ग़ज़ल ---बाकी अभी है और फ़ज़ीहत कहाँ कहाँ

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लेंगे   हजार   बार   नसीहत   कहाँ  कहाँ ।
बाकी अभी है और  फ़जीहत कहाँ कहाँ ।।

चलना बहुत  सँभल  के ये  हिन्दोस्तान है ।
मिलती यहां सभी को हिदायत कहाँ कहाँ।।

मजहब कोई बड़ा है तो इंसानियत का है ।
पढ़ते  रहेंगे  आप  शरीअत  कहाँ  कहाँ ।।

वादा  किया  हुजूर  ने  बेशक  चुनाव  में ।
यह बात है अलग कि इनायत कहाँ कहाँ।।

बदलेंगे लोग ,सोच बदल दीजिये जनाब ।
रक्खेंगे आप इतनी  अदावत  कहाँ कहाँ ।।

ईमान   बेचता   है   यहाँ   आम   आदमी ।
करते   रहेंगे  आप   हुकूमत  कहाँ  कहाँ ।।

कैसे   रिहा  हुआ  है  यही  पूछते  हैं सब ।
होती  है पैरवी में किफ़ायत  कहाँ  कहाँ ।।

है देखना तो देखिए  मुफ़लिस की जिंदगी ।
मत देखिए हैं लोग  सलामत  कहाँ  कहाँ ।।

सहमें  हुए  हैं चोर  हकीकत  ये  जानकर ।
आएगी इक नज़र से कयामत कहाँ कहाँ ।।

हालात  देख  के वो  समझने लगे  हैं  सब ।
ये  ग़म कहाँ कहाँ  ये  मसर्रत कहाँ  कहाँ।।

चोरों  को   भी  तलाश  है  ईमानदार  की ।
ढूढा ज़मीर  में  है  सदाक़त  कहाँ  कहाँ ।।

           नवीन मणि त्रिपाठी 
         मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल - तू सलामत रहे यूँ छोड़ के जाने वाले

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मेरी   आबाद   मुहब्बत  को  मिटाने  वाले ।
तू  सलामत   रहे   यूँ  छोड़  के  जाने वाले ।।

चन्द   रातों   की  मुलाकात  न्   सोने  देगी ।
याद   आएंगे  बहुत   नींद  चुराने   वाले ।।

कितना बदलाहै जमाने का चलन देख जरा।
तोड़  जाते  हैं ये  दिल ,प्यार  निभाने वाले।।

इस तरह रूठ के जाने की जरूरत  क्या थीं।
यूँ  किताबों  में  गुलाबों  को  छिपाने  वाले ।।

चार अशआर लिखे थे जो कभी ख़त में तुझे।
क्या मिला तुझको मेरे ख़त को जलाने वाले ।।

आज निकले वो गली से तो छुपा कर चेहरा ।
मेरी   तस्वीर  को  आंखों में सजाने  वाले ।।

रुख बदलते ही हवाओं ने सितम क्या ढाया ।
खो   गए   लोग   मेरे  नाज़ उठाने  वाले ।।

प्यार  का मैं  हूँ  मुसाफिर न् मुझे रोको तुम ।
है   कई   लोग  यहां   राह  बताने    वाले ।।

जिंदगी  भीड़   में   गुजरे  ये   तमन्ना  मेरी ।
मेरी  तन्हाई   में  आते   हैं  सताने    वाले ।।

कोई सुकरात को ,शंकर तो कोई  मीरा को।
ज़हर  के  साथ  मिले  लोग  पिलाने  वाले ।।

इश्क़ बिकता है खुले आम जरूरत पे यहां ।
शह्र   में   खूब    हैं  दूकान   चलाने  वाले ।।

           नवीन मणि त्रिपाठी 
            मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल ----मर रहा आंखों का पानी देखिए

बात    उसकी    आसमानी    देखिए ।
मर  रहा  आंखों   का  पानी  देखिए ।।

फिर किसी फारुख की गद्दारी  दिखी ।
बढ़    रही    है   बदजुबानी  देखिए ।।

पत्थरों   से   बाज  वो   आते   नही ।
कायरों    की    बदगुमानी   देखिए ।।

कौन   कहता  डर  गया  है   रोमियो ।
रास्तों    पर     छेड़खानी     देखिए ।।

वह   नकाबों  की  घुटन  से  ऊबकर ।
कहती   है   कोई   कहानी    देखिए ।।

रायफल   लेकर    खड़े   भूटान   में ।
दिल   यहां    हिन्दोस्तानी    देखिए ।।

अब  पीओके   चाइना  का  हो गया ।
पाक   की   भी  मेहरबानी   देखिए ।।

 लोभियों  के  दंश  में विष  है  बहुत ।
बेटियां   घर    में    सयानी   देखिए ।।

देखना   है  जुर्म   की  तासीर   जो ।
आप   अपनी   राजधानी   देखिए ।।

लोग   इंटरनेट  में  उलझे  है   यहां ।
देश  की   ढहती   जवानी  देखिए ।।

आ  गया  है  क्या  जमाना  दोस्तों ।
 हाँकते   सब    लन्तरानी   देखिए ।।

 सिर्फ अंग्रेजी  में  करते   बात  वो ।
 कुछ गुलामी की  निशानी  देखिए ।।

          नवीन मणि त्रिपाठी
         मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल -- हमें मालूम है इल्ज़ाम तय है

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तुम्हारी बज्म में  इक  शाम  तय  है ।
फ़िजा में इश्क़  का अंजाम  तय है ।।

सफाई  से  मिलेगा  क्या हमे  अब ।
हमें   मालूम  है  इल्ज़ाम  तय   है ।।

भटकने  की जरूरत  क्या है  यारों ।        फ़ना  के बाद भी  तो धाम  तय है ।।

गरीबों   का    उड़ा  बैठे  हो  चारा ।
तुम्हारे  हक़ में कब आराम  तय है ।।

हमारी  उम्र  का   है  तज्रिबा  यह ।
शराफ़त  में  बड़ा  संग्राम  तय  है ।।

नई  कुर्सी  पे वो  बैठा  है जब  से ।
बताते  लोग  हैं  कोहराम  तय  है ।।

अगर मौला ने बख़्सी  जिंदगी यह ।
हमारे  हाथ  का  भी काम  तय है ।।

वो हाकिम की खुशामद में लगा था।
उसी का आज फिर इनअाम तय है ।।

हथेली  की  लकीरों  को  जरा  पढ ।
मेरी  किस्मत  में  तेरा  नाम  तय है ।।

निभाओगे   कहाँ  तक  साथ  मेरा ।
तुम्हारे  वक्त  का  तो  दाम  तय है ।।

           नवीन मणि त्रिपाठी 
          मौलिक अप्रकाशित

हौसला फिर कोई बड़ा रखिये

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हौसला  फिर  कोई   बड़ा  रखिये ।
खुद के  होने  की इत्तला  रखिये ।।

बन्द  मत   कीजिये  दरीचों  को ।
इन हवाओं का सिलसिला रखिये ।।

हार   जाएं   न   कोशिशें    मेरी ।
मेरे खातिर भी कुछ दुआ रखिये ।।

खो  न  जाऊं  कहीं  जमाने  में ।
हाल क्या  है  जरा  पता रखिये ।।

दुश्मनी  खूब   कीजिये  लेकिन ।
दिल से जुड़ने का रास्ता रखिये ।।

गर जमाने  के  साथ है  चलना ।
मुज़रिमों से भी वास्ता  रखिये ।।

लोग   मिलते  यहां  नकाबों  में ।
कुछ हक़ीक़त यहां छुपा रखिये ।।

जिंदगी   में   सुकूँ   ज़रूरी    है ।
आसमां सर पे मत उठा रखिये ।।

है शुकूँ  की अगर  तलास बहुत ।
हुक्मरां से  भी लस्तगा  रखिये ।।

काम   बिगड़े  अगर  बनाने  हैं ।
तो खुशामद  का पैतरा  रखिये ।।

हो इजाज़त  तो आप से कह  दूं ।
पास अपने ये  मशबरा  रखिये ।।

बिक  गया  बाप  पढाकर  बेटा ।
काम  के  नाम  घुनघुना रखिये ।।

             नवीन मणि त्रिपाठी
            मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल - कोई हसरत उफ़ान तक आई

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बात दिल की  जुबान  तक आई । 
कोई हसरत  उफ़ान  तक आई ।।

मैं  नहीं  बन्द  कर  रहा  कोटा ।
यह  बहस संविधान  तक आई ।।

हौसले  फिर  जले   सवर्णो   के ।
रोशनी  आसमान  तक    आई ।।

फायदा  क्या  मिला  हुकूमत से ।
बस नसीहत लगान तक आयी ।।

मिटती  हस्ती  को  देखता हूँ  मैं ।
आंख जब भी रुझान तक आई ।।

यह  नदी इंतकाम  की  खातिर ।
आज हद के निशान तक आई ।।

हक जो मांगा है,औरतों ने कभी ।
रोज  चर्चा  कुरान  तक   आई ।।

बूंद भर  ही  सही  मगर  स्याही ।
तेरे   झूठे   गुमान   तक  आई ।।

तीर  बेशक  नही  चला लेकिन ।
एक उगली  कमान  तक  आई ।।

फंस गई जाल में वही चिड़िया ।
जो थी लम्बी उड़ान तक आई ।।

जुर्म पकड़ा गया है फिर उसका ।
खोज  ऊंचे  मचान  तक  आई ।।

खूब  बारूद  का   सिला  लेकर ।
कोई  आफ़त मकान  तक आई ।।

          नवीन मणि त्रिपाठी
         मौलिक अप्रकाशित

तेरी आँखों मे

2122  1212  1122  22

है   कोई   तिश्नगी  जरूर   तेरी  आँखों   में |
मीठे   एहसास  का  सरूर  तेरी  आँखों  में ||

जब भी देखा गया ये अक्स किसी दर्पण में ।
बे  अदब  आ  गया , गुरूर   तेरी  आँखों में ||

ख़ास मुश्किल के बाद ही तेरे दर तक पहुँचा ।
कुछ  उमीदें  दिखीं  हैं  दूर  तेरी  आँखों   में ।।

मैं तो  हाज़िर  था  तेरीे एक नज़र पर  साकी ।
बेसबब   क्यो  हुआ  फितूर  तेरी  आँखों  में ।।

जाम छलके नहीं  है आज तलकभी तुझसे ।
है   बड़ा   कीमती   शऊूर   तेरी  आँखों  में ||

मंजिलो की तलाश में ये भटकती  ख्वाहिश ।
देख   ली  जन्नतों  की  हूर   तेरी  आँखों  में ||

हार   बैठे  थे   जिंदगी  के  अंधेरों   से   हम।
मिल  गया  जिंदगी  का  नूर तेरी आँखों  में ||

हो  के  बेचैन  जब  मैं  तुझको  भुलाना चाहा |
फिर दिखा   है  मेरा   कसूर   तेरी  आँखों  में ||

                          नवीन

गुरुवार, 13 जुलाई 2017

ग़ज़ल - जिसने कभी वफ़ा से किनारा नही किया

*221  2121 1221  212*

किस्मत ने उसके साथ करिश्मा नही किया । 
जिसने कभी वफ़ा से  किनारा नहीं  किया ।।

रहना  पड़ा  उसी  के  हरम  में तमाम उम्र ।
जिसने  हमारा  साथ  गवारा  नहीं  किया ।।

कितनी मिली जफ़ा है  मुहब्बत के वास्ते ।
तुमने  कभी  हिसाब पे चर्चा नहीं किया ।।

कानून पास  हो चुके  मुद्दों  के  नाम पर ।
किसने कहा करों में इजाफा नहीं किया ।।

लुटती  है  आबरू  जो  सरेआम  शह्र में ।
कहते हैं लोग हुस्न पे परदा  नहीं  किया ।।

शायद कोई ख़ता हुई जबसे नज़र मिली।
उसने  इधर निगाह  दुबारा  नहीं  किया ।।

इफ़्लास का हमारे जब उसको पता चला ।
तब  से  वो  ऐतबार  हमारा  नहीं  किया ।।

कुछ  तो  सहा  है  दर्द  जरा मानिए हुजूर ।
शब भर दुआ के साथ गुजारा नहीं किया ।।

कितना  बदल  गया है यहां आम आदमी ।
इज्ज़त  गई  तो  शोर शराबा नहीं किया ।।

         --नवीन मणि त्रिपाठी
         मौलिक अप्रकाशित 
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ग़ज़ल -- दर्द गहरा था

2122 1122 1122 22(112)
दर्द गहरा  था मगर  हद  से  गुज़रने  न  दिया ।
अश्क़ हमने भी कभी आंख  में आने  न दिया ।।

आसमा   में  वो  परिंदे  ही  सफ़र  करते  हैं ।
जिन परिंदों ने कभी पर को कतरने न दिया ।।

आज खामोश हैं घुघरू जो खनकते थे कभी ।
वक्त  बेचैन  से  पावों  को  थिरकने  न दिया ।।

ख्वाहिशें  खूब  जवाँ  थी   किसी  मैखाने  में ।
मेरे   मौला  ने   मुझे  रात  बहकने  न   दिया ।।

मैंने  तूफान   में   चेहरे   पे   सिकन  देखा  है ।
उन  हवाओं  ने  कभी  जुल्फ सँवरने न दिया ।।

उंगलिया  लोग  उठाते  हैं  उसी  पर  अक्सर ।
जिंदगी भर जो कदम घर से बहकने न दिया ।।

यह  हक़ीक़त   है  खरीदार  बहुत  थे   उनके ।
यूँ  तिज़ारत में  कभी भाव को गिरने न दिया ।।

जीत  सकते  थे  मुहब्बत की ये बाजी शायद ।
एक  सिक्का  भी मेरे नाम  उछलने न  दिया ।।

क़द्र क्या है ये हिफ़ाज़त के उसूलों से मिला ।
मेरे  साकी  ने  कहीं जाम छलकने न  दिया ।।

            ----नवीन मणि त्रिपाठी 
             मौलिक अप्रकाशित 
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ग़ज़ल - हमारे इश्क़ की तहरीर

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हमारे  इश्क की  तहरीर  गर मंजूर  हो  जाये ।

हमारे जख्म का  हर दर्द भी काफूर हो जाये ।।


दुपट्टे को हवा में यूं उड़ाकर क्या मिला तुझको ।

मुझे डर है  न दीवाना  कहीं  मशहूर  हो जाये ।।


अना के साथ उसके हुस्न की होती नुमाइश है ।

कहीं ऐसा न्  हो  तारीफ से  मगरूर हो जाये ।।


मुहब्बत रोज जिंदाबाद हो अहले चमन में अब ।

तुम्हारे शहर का भी  कुछ  नया दस्तूर हो जाये ।।


मुकम्मल हो तबस्सुम का नज़ारा इन फिजाओं में ।

कोई  सूखा  हुआ चेहरा भी अब अंगूर  हो  जाये ।।


तुम्हारी इस तरक्की से बहुत  डरने  लगा  है वो ।

 न हक से  बेदखल  कोई  यहां  मजदूर हो जाए ।।

बुधवार, 12 जुलाई 2017

ग़ज़ल - मौत के जश्न पे सम्वाद करेगी दुनिया

*2122  1122  1122  22*
इस   तरह   अम्न  को   बर्बाद   करेगी   दुनिया ।
फिर   नए   जुर्म   को   ईजाद  करेगी  दुनिया ।।

छीन   लेती   है  निवाले   भी   मेरे   बच्चों  से ।

कब  तलक  कर्ज  से आज़ाद  करेगी  दुनियां ।।

जब भी मकसद का शजर बनके नज़र आऊंगा।

मेरी   ताक़ीद   पे    फरियाद   करेगी  दुनिया ।।

रोज   उठता   है  धुंआ   एक  कहानी  लेकर ।

क्या  बताऊँ  की  किसे  याद करेगी  दुनिया ।।

है  सराफ़त से  तेरी  बज्म  में जीना मुश्किल ।

साफ  दामन  पे  बहुत  शाद  करेगी दुनिया ।।

कत्ल  करने  का सलीका भी अजब है यारों ।

हर  सही  बात  पे  अपवाद  करेगी  दुनिया ।।

मुफ़लिसी देख  के अपने भी  मुकर जाते  हैं ।

कौन  कहता  है कि  इमदाद करेगी  दुनिया ।।

जख्म देकर के वो मरहम की खबर रखती है ।

लूटकर  घर  मेरा   आबाद   करेगी   दुनिया ।।

नव  निहालों  की  हथेली  में  है बारूद बहुत ।

अब  तो मासूम  को जल्लाद  करेगी दुनिया ।।

रोज  ऐटम  की  नयी   खेप   बना  देती   है  ।

मौत  के जश्न   पे  सम्वाद   करेगी   दुनिया ।।

          नवीन मणि त्रिपाठी 

        मौलिक अप्रकाशित 
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ग़ज़ल - हाकिमों से मशबरा हो जाएगा

2122 2122 212 

वह   हमारा   आइना   हो   जाएगा ।
सच कहूँ दिल का खुदा हो जाएगा ।।

हैं   विचाराधीन  सारे   जुर्म   क्यों ।
फिर इलेक्शन में खड़ा हो जाएगा ।।

फैसले  होंगे उसी के हक़  में अब ।
हाकिमों से  मशबरा  हो  जाएगा ।।

इस सियासत में कोई जल्लाद भी ।
जिंदगी  का  रहनुमा  हो  जाएगा ।।

देखना  तुम  भी  इसी  बाजार  में ।
सच भी कोई मकबरा हो जाएगा ।।

फिर कहर ढाने लगा है वह शबाब ।
हुस्न पर  कोई  फ़ना  हो  जाएगा ।।

शरबती आंखों की हरकत देख कर ।
यह मुसाफ़िर गमज़दा हो जाएगा ।।

रिंद  चर्चा   कर   रहे   हैं  आपकी ।
आपका  घर  मैकदा  हो  जाएगा ।।

चन्द  लम्हा  ही  सही पर एक दिन ।
तू   हमारा   हौसला  हो   जाएगा ।।

बेवफा  पर  कर लिया मैंने यकीन ।
क्या खबर थी बावफ़ा हो जाएगा ।।

            नवीन मणि त्रिपाठी 
            मौलिक अप्रकाशित 
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ग़ज़ल - तुम्हारे हुस्न का सानी नहीं है

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हुई  तारीफ   गुस्ताखी   नहीं   है ।
तुम्हारे  हुस्न  का  सानी नहीं  है ।।

चली आओ  हमारी  बज्म में भी ।
हमारी  बज्म  अनजानी नहीं  है ।।

तेरी यादों से ये  शम्मा  है  रोशन ।
मेरी  चाहत  अभी  हारी नहीं  है ।।

मुकद्दर  आजमाइस  कर रहा हूँ ।
मेरा फ़तबा  कोई  जारी नहीं  है ।।

हमारी  इल्तज़ा है  लौट  आओ ।
हमारे   पास   मक्कारी  नहीं  है ।।

बहुत नाराज़ हो यह जानकर भी ।
सिवा  तेरे   कोई  यारी  नहीं  है ।।

ग़ज़ल की रूह से वाकिफ नहीं जो ।
ग़ज़ल उनसे लिखी जाती नहीं है ।।

मुहब्बत बन गई तासीर  जिसकी ।
फ़ना  वो   शायरी  होती  नहीं  है ।।

कभी बेदर्द मत समझा करो  तुम ।
खुदा  की  बेरुखी  भाती  नहीं  है ।।

मेरी आवारगी  का  फिक्र  उसको ।
उसे भी  नींद  अब आती  नहीं  है ।।

फलक में चाँद का चेहरा हो जब भी ।
पलक तक आंख झपकाती नहीं हैं ।।

अजब है हाल इस दीवानगी का ।
हमारी  तिश्नगी  जाती  नहीं  है ।।

          नवीन मणि त्रिपाठी 
         मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल - तेरी आंखों में

2122  1212  1122  22

है   कोई   तिश्नगी  जरूर   तेरी  आँखों   में |
मीठे   एहसास  का  सरूर  तेरी  आँखों  में ||

जब भी देखा गया ये अक्स किसी दर्पण में ।
बे  अदब  आ  गया , गुरूर   तेरी  आँखों में ||

ख़ास मुश्किल के बाद ही तेरे दर तक पहुँचा ।
कुछ  उमीदें  दिखीं  हैं  दूर  तेरी  आँखों   में ।।

मैं तो  हाज़िर  था  तेरीे एक नज़र पर  साकी ।
बेसबब   क्यो  हुआ  फितूर  तेरी  आँखों  में ।।

जाम छलके नहीं  है आज तलकभी तुझसे ।
है   बड़ा   कीमती   शऊूर   तेरी  आँखों  में ||

मंजिलो की तलाश में ये भटकती  ख्वाहिश ।
देख   ली  जन्नतों  की  हूर   तेरी  आँखों  में ||

हार   बैठे  थे   जिंदगी  के  अंधेरों   से   हम।
मिल  गया  जिंदगी  का  नूर तेरी आँखों  में ||

हो  के  बेचैन  जब  मैं  तुझको  भुलाना चाहा |
फिर दिखा   है  मेरा   कसूर   तेरी  आँखों  में ||

                          नवीन

सोमवार, 26 जून 2017

ग़ज़ल --तेरी महफ़िल में दीवाने रहेंगे

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शमा    के   पास    परवाने   रहेंगे ।
तेरी  महफ़िल  में   दीवाने   रहेंगे ।।

तुम्हारी शोखियाँ कातिल हुई हैं ।
तुम्हारे    खूब   अफ़साने   रहेंगे ।।

बना देंगे नया इक ताज़ हम भी ।
हमें  जब  हाथ  कटवाने  रहेंगे ।।

तुम्हारी   बज्म  में  आता  रहूँगा ।
खुले जब  तक  ये  मैखाने  रहेंगे ।।

जिसे है फिक्र दौलत की नहीं अब ।
उसी    के   साथ  याराने  रहेंगे ।।


तुम्हारी शोखियाँ कातिल हुई हैं ।
तुम्हारे  खूब  अफ़साने रहेंगे ।।

बड़ा  इल्जाम  फिर लगने लगा है ।
हजारों    जख्म   पहचाने   रहेंगे ।।

 हवाओं में गजब खुशबू है उसकी ।
कहाँ  तक  लोग  अनजाने  रहेंगे ।।

चुरा लेते हैं अक्सर लोग दिल को ।
अभी  पहरे  पे  कुछ थाने  रहेंगे ।।

हमें  है  याद उसका हर तरन्नुम ।
हमारे   साथ   नज़राने   रहेंगे ।।

न् जाओ इस तरह से छोड़ कर अब ।
कई   कूचे   तो   वीराने    रहेंगे ।।

छलकती मय का जादू जब तलक है।
नज़र  के   पास   मस्ताने   रहेंगे ।।
             ---- नवीन मणि त्रिपाठी
                 मौलिक अप्रकाशित
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ग़ज़ल

*221 2121  1221  212*

कैसे  कहूँ  मैं  आपसे   मुझको  गिला  नहीं ।
चेहरे  से  क्यूँ नकाब अभी तक उठा नहीं ।।

भूखा किसान शाख  से लटका हुआ  मिला ।
शायद  था  उसके  पास  कोई  रास्ता नहीं ।।

नेता  को चुन  रहे  हैं  वही  जात  पाँत  पर ।
जिसने कहा था जात मेरा  फ़लसफ़ा नहीं ।।

मजबूरियों  के  नाम  पे  बिकता  है आदमी ।
तेरे   दयार   में   तो   कोई   रहनुमा   नहीं ।।

मुझसे   मेरा  ज़मीर   नहीं   माँगिये   हुजूर ।
इसकी ही वज़ह से मैं अभी तक मरा नहीं ।।

हालात  आजमा  के  गए  मुझको  बार बार ।
रहमत खुदा की थी कि नज़र से गिरा नहीं।।

उठती  हैं   बेटियां  भी  यहां  रोज  कार  से ।
मत  बोलिये  कि  बाप  यहां गमज़दा नहीं ।।

उलझा दिया चमन है ये मजहब के नाम पर ।
रोटी   से  हुक्मरां   का  कोई  वास्ता  नहीं ।।

चेहरे को  देखकर  वो मुकरते हैं इस  तरह ।
जैसे  हो  उनके  पास  कोई  आईना  नहीं ।।

कोटे  से  कर रहे  हैं सियासत  वो  देश  में ।
पैनी  सी ज़ेहन पर  है  कोई  तबसरा नहीं ।।

            -- नवीन मणि त्रिपाठी

ग़ज़ल -- तेरे चमन में देखा तन्हाइयों की चर्चा

*221  2122  221 2122*
तेरे चमन में  देखा  तन्हाइयों की चर्चा ।
कुछ  लोग कर रहे हैं दुष्वारियों की चर्चा  ।।

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चेहरा छुपा छुपा के वह रोज मिल रही है ।
होने लगी है उसकी लाचारियों की चर्चा ।।
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चुपचाप वो खड़े हैं देखा कभी था जिनको ।
मशहूर कर गई थी बेबाकियों की चर्चा ।।
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चलती रही वो अक्सर बनकर के रूह मेरी ।
क्यो आज हो रही है परछाइयों की चर्चा ।।

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मुँह फेर कर गई हैं खुशियां भी मेरे दर से ।
जब से हुई हमारी बीमारियों की चर्चा ।।

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नज़रों से सब बयाँ है चेहरा खिला खिला है ।
सुनकर गई है वह भी शहनाइयों की चर्चा ।।

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यूँ ही ग़ज़ल हुई थी मालूम था कहाँ ये ।
पैनी नज़र से होगी बारीकियों की चर्चा ।।

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शायद वो शहर भर में बदनाम हो चुका है ।
सबकी जुबां से सुनता रुसवाइयों की चर्चा ।।

              नवीन मणि त्रिपाठी

ग़ज़ल--झुकी झुकी सी नज़र में देखा

-----**** ग़ज़ल ***------

121  22  121 22 121 22 121 22
       
झुकी   झुकी  सी  नज़र  में   देखा ,
कोई   फ़साना   लिखा   हुआ   है ।।
ये    सुर्ख   चेहरा    बता   रहा   है 
के दिल का  मौसम  जुदा  जुदा है ।।

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फ़िजा  की   सूरत   बदल   रही   है ,
अजीब  मंजर  है  आशिकी    का ।।
हैं    मुन्तजिर    ये    सियाह   रातें ,
वो  चांद  कितना  ख़फ़ा  खफ़ा है ।।

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तमाम    शिकवे    गिले    हुए     हैं ,
तमाम     बातें    बयाँ    हुई      हैं ।
जो   फासले   बन   गए  थे तुझसे ,
क्यों  रफ्ता  रफ्ता   बढ़ा   रहा   है ।।
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सबा   भी   सरसर    बनी    हुई   है ,
सुकूँ   के  लम्हों   ने   साथ   छोड़ा ।
ये    तीरगी   का   अजीब   आलम, 
चिराग   घर  का   बुझा   बुझा  है ।।

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जरूर   कुछ   तो   मलाल   होगा , 
हमारी    चाहत  के    हौसलों  से ।
ऐ   हुस्न  वाले   बता   तो   मेरा ,
गुनाह   जो  यूँ कटा   कटा   है ।।

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 जो  आग  दिल  में  लगा  गए थे , 
वो आग  अब  तक  बुझी  नहीं  है ।
सुलग रही  है  ये  दिल  की  बस्ती ,
दयार   में  अब   धुंआ   धुंआ  है ।।

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यहाँ   रकीबों   की   महफिलों   में , 
तेरी    अदाएं    मचल    रही     हैं ।
तेरे    उसूलों   की   सरजमीं    पर ,
वफ़ा  का  झंडा   झुका  झुका  है ।।

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नकाब   इतना   उठा  के  मत  चल
 हैं   रिंद   मुद्दत   से    तिश्नगी   में ।
ये  जाम  छलका  न आंख  से अब
ये  मैकदा  क्यूँ   खुला   खुला  है ।।

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न    नींद   आई    न   चैन  तुझको
न  होश  में  क्यूँ  मिले अभी  तक ।
ये   तेरा   लहजा    बता   रहा    है 
ये   इश्क  तेरा  नया    नया     है ।।

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कोई  तो  रहबर  है  तेरे  दिल   का ,
किसी  की  नजरें  हुई   हैं  कातिल ।
जो  नूर   करता   था  बज्म  रोशन ,
वो   नूर    कैसा   लुटा    लुटा    है ।।

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ओ    जाने   वाले   जरा  ठहर   जा 
इधर   भी  अपनी   निगाह  कर  दे ।
जो  जख्म  मुझको  मिला था तुझसे 
वो  जख्म  अब  तक  हरा  हरा  है ।।

         -- नवीन मणि त्रिपाठी 
          मौलिक अप्रकाशित 
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ग़ज़ल 50 शेर के साथ

-------ग़ज़ल -------52 शेर के साथ
2122 1212 22
बात   तुम  भी  खरी  नही करते ।
काम  कोई  सही   नही    करते ।

चोट दिल पर लगी है फिर उनके।
काम  ये  मजहबी  नहीं   करते ।।

जब से अफसर बना दिया कोटा ।
बात  अच्छी  भली  नहीं   करते ।।

दोस्तों   की   किसी  तरक्की  में ।
यूँ   मुसीबत  खड़ी  नहीं करते ।।

जिंदगी  पर  यकीन  है  जिनको ।             वो  कभी खुदकुशी  नहीं  करते ।।

कुछ  तो  खुन्नस  बनी  रही होगी ।
बेसबब     बेरुखी   नहीं   करते ।।

पेंग  गर  प्यार   की  बढ़ानी    है ।
प्यार   में   हड़बड़ी  नही  करते ।।

है मुहब्बत  का आसरा  जिनको ।
हुस्न  की  रहबरी   नहीं    करते ।।

सिर्फ मिसरे से काम क्या चलता ।
टिप्पणी कुछ  कभी  नही करते ।।

थी    गरीबी  की  दास्तां    होगी ।
काम  गन्दा  सभी  नहीं   करते ।।

हमको मालूम राज की कीमत ।
बेवफाई    कभी   नही   करते ।।

जिनको मंजिलकी फिक्रहै काफी ।
वक़्त  से   दुश्मनी  नहीं    करते ।।

है पता उन्को  कैफियत अपनी ।
वो   इधर  तर्जनी  नहीं  करते ।।

ये  मुहब्बत  है खेल  मत मुझसे ।
हम  कभी  दिल्लगी नहीं करते ।

रहनुमाई   चली   गई   जब  से ।
बात  तब से  बड़ी  नहीं  करते ।।

वोट  पाकर  वो खो गया वरना ।
लोग  बे  इज्जती नहीं  करते ।।

है मुहब्बत  का आसरा  जिनको ।
हुस्न   की  रहबरी  नहीं   करते ।।

चोट दिल पर लगी है फिर उनके ।
काम  ये  मजहबी  नहीं   करते ।।

पेंग  गर  प्यार   की  बढ़ानी   है ।
प्यार  में  हड़बड़ी   नही    करते ।।

सिर्फ मिसरे से काम  क्या चलता ।
टिप्पणी  कुछ  नई   नही  करते ।।

वो  निशाने  पे   तीर  था   वरना ।
वो  कभी  खलबली  नहीं  करते ।।

बैठ  जाये  कोई  मेरे   सर    पर ।
छूट   इतनी  खुली  नहीं   करते ।।

सर  फ़रोसी  की  है  तमन्ना  अब ।
वार  में  बुजदिली   नहीँ    करते ।।

कीमतें    वे    वसूलते   हैं   जो।
माल  अपना  दही  नहीं   करते ।।

शर्त  है  जिस्म  दिल लगाने  की ।
लोग  क्या ज्यादती  नहीं  करते ।।

गर   किसानों  से  वास्ता  रखते ।
मुल्क  में  भुखमरी  नहीँ  करते ।।

कुछ  तबीयत मचल  गयी  होगी ।
हम  कभी  आशिकी नही  करते ।।

मुफ़्लिशी दौर से जो है वाकिफ़ ।
वो   हमारी  हसी   नहीँ   करते ।।

फंस न्  जाएं  ये पाँव  ही अपने ।
हम  जमीं  दलदली  नहीं  करते ।।

खास शातिर हैं इश्क के मुजरिम ।
हाथ  में  हथकड़ी  नहीं   करते ।।

है  छुपाना अगर  ये धन  काला ।
बिस्तरे  मखमली  नहीं  करते ।।

खर्च का बोझ बढ़ गया जब से ।
बात अब रस भरी नही  करते ।।

सर्जिकल  हो गई वहां  जब  से ।
मूछ   अपनी  तनी  नहीं  करते ।।

ध्यान  देतीं  नहीं  अगर   मैडम ।
आज  हम  शायरी  नहीं  करते ।।

मैं तो ठहरा हूँ इस तरह दिल मे ।
आप अब हाजिरी  नहीं  करते ।।

देश   द्रोही   है  कन्हैया  उनका ।
दुश्मनों   की  कमी  नहीं  करते ।।

फिर हुए हैं  जवान  क्यो जख्मी।
लोग क्या  मुखबिरी नहीं  करते ?

नेकियाँ    बेहिसाब   हैं  उनकी ।
हम  कभी  भी बदी  नहीं करते ।।

क्यों  उमीदें  लगा  के  बैठे  हो ।
अब्र   ये  चांदनी   नहीं   करते ।।

जब  से  लूटा  है लाल  कुर्ते ने ।
रेलवे   में   कुली   नहीं  करते ।।

बाम   पंथी  बिके   हुए  शायद ।
जुर्म  पर  सनसनी  नहीं  करते ।।

जब भी  मारा है  उसने आतंकी ।
क्यों वे जाहिर खुशी नहीं करते ।।

मैं भी  आज़ाद हो  गया होता ।
तेरे  शिकवे   बरी  नहीं करते ।।

जब से दौलत का  हाल जाना है ।
आँख  वो  शरबती  नहीं  करते ।।

कोई राधा नहीं दिखे तब तक ।
होठ  पर  बाँसुरी  नहीं  करते ।।

काफ़िया वो   बना  रहे   काफी ।
ध्यान   हर्फे   रवी   नहीं   करते ।।

गर कलम जारही है मंजिल तक ।
रोक कर  मन  दुखी नहीं करते ।।

काम   ऐसा   बचा   नहीं   कोई ।
अब जिसे आदमी  नहीं  करते ।।

मिल गया जब से है उन्हें वोहदा ।
बात  भी  लाजिमी  नहीं  करते ।।

शुद्ध  पण्डित का है लहू  रग   में ।
काम  मे  जाहिली  नहीं  करते ।।

हो   गई    हाफ    सेंचुरी   शायद।
बात  हम   बेतुकी   नहीं    करते ।।

            - नवीन मणि त्रिपाठी 
            मौलिक अप्रकाशित 
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ग़ज़ल ---हाथ काफी मले गए हर सू

-----ग़ज़ल -----

*2122  1212  22*

 हाथ   काफी  मले  गए  हर  सू ।
कुछ   सयाने  गए  छले  हर सू ।।

बात    बोली   गई    दीवारों  से ।
खूब   चर्चे  सुने  गए    हर  सू ।।

आग का कुछ पता न् चल पाया ।
 बस धुंआ ही धुंआ उठे हर सू ।।

इक तरन्नुम में पढ़ ग़ज़ल मेरी ।
ये  ज़माना  तुझे  सुने  हर सू ।।

जुर्म  की हर निशानियाँ  कहतीं ।
अश्क़ यूं ही नहीं  बहे  हर  सू ।।

वह   मुहब्बत  में  डूबती  होगी ।
ढूढ़  दरिया  में  बुलबुले  हर सू ।।

इश्क का कुछ असर उन्हें भी  है ।
रह  रहे   हैं  कटे   कटे  हर  सू ।।

मुस्कुरा  कर  वो  कत्ल करते  हैं ।
लोग  मिलते  कहाँ  भले  हर सू ।।

सर पे बांधे कफ़न  मिला है वह ।
अब   इरादे  बड़े  बड़े   हर   सू ।।

कुछ   तरक्की   नही  हुई  उनसे ।
सिर्फ  मुद्दे  बहुत  उठे  हर सू ।।

आज   उसने  नकाब   फेंका  है ।
देखिए आज  जलजले  हर  सू ।।

उनके आने की खबर है शायद ।
रंग   बिखरे   हरे  हरे  हर   सू ।।

प्यास देखी  गयी  नहीं   उनसे ।
अब्र आकर  बरस गए  हर सू ।।

कितनी भोली अदा में दिखती है ।                         चल रहे खूब सिलसिले  हर सू ।।

कुछ अदब का लिहाज है वरना ।                        उसके  चर्चे   बड़े   बुरे  हर  सू।।

बेबसी   पर  सवाल  मत   पूछो । 
लोग मुश्किल से तन ढके हर सू ।।

नज़नीनो  का  क्या  भरोसा  है ।               जब मिले  बेवफा मिले हर सू ।।

कितनी ज़ालिम निगाह है साकी ।           रोज आशिक  दिखे  नए हर सू ।।

रोजियाँ   वो  नहीं   बढ़ा   पाए ।
हो गए  खूब  मनचले   हर  सू ।।

होश आने का जिक्र  कौन करे ।
खुल रहे  रोज  मैकदे  हर  सू ।।

कुछ अंधेरा   नही  मिटा  पाए ।
दीप लाखों मगर  जले हर सू ।।

 रात मिलकर गई है  जब से वो ।
हो रहे  तब  से  रतजगे  हर सू ।।

 कोई  पढ़ता  नही  सुख़न  मेरे ।
क्या सुख़नवर नहीं  बचे हर सू ।।

 अब कलम बन्द कर दिया हमने ।
हौसले   हैं   बुझे  बुझे   हर  सू ।।

          --- नवीन मणि त्रिपाठी

ग़ज़ल

2122  2122  2122  212

मैं तेरे अहले चमन का सिलसिला हो जाऊंगा।
बेवफा मुझको कहो मत मैं अता हो जाऊंगा ।।

कुछ तेरी फ़ितरत है ऐसी कुछ मेरी आवारगी ।
वस्ल  के आने  पे तेरा मयकदा हो  जाऊंगा ।।

घुघरूओं  की  ये  सदायें छू  रही हैं रूह  को ।
मैं तेरी महफ़िल में आकर बाखुदा हो जाऊंगा।।

अब  मेरे  हालात  पर नज़रे  इनायत कीजिये ।
आपकी इस जिंदगी का तज्रिबा हो जाऊंगा ।।

बज़्म  में   लाखों   दीवाने  आ  गए  हैं आपके ।
कौन  कहता आपका मै  रहनुमा  हो जाऊंगा ।।

कुछ नज़र में  तिश्नगी  है  हुस्न पर छाई बहार ।
अब  हुकूमत आपकी है मैं फ़ना हो जाऊंगा ।।

ये   नज़ाक़त  ये अदाएं  ये  तुम्हारी  शोखियाँ ।
देख  लेना फिर मुझे जब आईना हो जाऊंगा ।।

खिड़कियों से झांककर देखाकरो मतइस तरह।
दिल बहुत नाजुक है मेरा मैं फिदा हो जाऊंगा।।

लोग  पूछेंगे   तुम्हारे   दिल के जब भी  रास्ते  ।
क्या ठिकाना है तुम्हारा वह पता  हो जाऊंगा ।।

शह्र  में  चर्चा  बहुत है  हर जुबाँ  पर है सवाल ।
लगरहा सबकी ज़ेहन का फ़लसफ़ा हो जाऊंगा।

है  मुहब्बत आज  भी  जिंदा  मेरे  अरमान में ।
क्या खबर थी मैं तुम्हारी इक ख़ता होजाऊंगा।

             नवीन मणि त्रिपाठी
               कॉपी राइट

ग़ज़ल

1222 1222 122
उसे  सर  पर   बिठाया  जा  रहा है ।
किसी  पे  जुर्म  ढाया  जा  रहा  है ।।

उन्हें  मालूम   है  अपनी   तरक्की ।
जहर  को  आजमाया  जा रहा है ।।

चलेगा किस तरह गर्दन पे  ख़ंजर ।
तरीका सब सिखाया  जा  रहा है ।।

जो नफरत में चलाता रोज  पत्थर ।
उसे   अपना  बताया जा  रहा  है ।।

जो चारा  खा  चुके  हैं जानवर  का ।
उन्हें   नेता  बुलाया   जा   रहा   है ।।

वो   गायें  काटते  हैं  वोट  खातिर ।
नया  मजहब  चलाया  जा  रहा है ।।

जे एन यू में है  गद्दारी  का  आलम ।
हमारा  घर   मिटाया  जा  रहा   है ।।

न  जाने  क्या  बिगाड़ा  सैनिकों  ने ।
मनोबल  फिर  गिराया जा रहा  है ।।

करोड़ो  लूट  कर  बोली  बहन जी ।
हमें   झूठा  फसाया  जा   रहा   है ।।

सियासत  हो  रही  है जातियों  पर ।
नया   कानून  लाया  जा  रहा   है ।।

सड़क तो बन चुकी कागज में देखो ।
हक़ीक़त  को  छुपाया जा  रहा  है ।।

सलाखों तक कहाँ जाते हैं मुजरिम ।
महज   पर्दा  उठाया  जा   रहा   है ।।

ये   मौसेरे  से  भाई  लग   रहे    हैं ।
बड़ा  रिश्ता  निभाया  जा   रहा  है ।।

            नवीन मणि त्रिपाठी 
          मौलिक अप्रकाशित 
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ग़ज़ल --फिक्र बनकर तिश्नगी देखा सँवर जाती है रोज़ ।

--------------------ग़ज़ल -------------

2122  2122  2122  212(1)

फिक्र   बनकर  तिश्नगी  देखा  सँवर  जाती है रोज़ ।
उस दरीचे  तक मेरी  सहमी  नज़र जाती  है रोज़ ।।

बेकरारी    साथ   लेकर   मुन्तज़िर   होकर खड़ी ।
एक आहट की खबर पर वह निखर जाती है रोज ।।

सिम्त  शायद   है  ग़लत  उलझे   हुए   हालात    हैं ।
है  मुसीबत  बदगुमां  घर  में  ठहर  जाती  है  रोज़ ।।

जिंदगी   के    फ़लसफ़े   में   है  बहुत    आवारगी ।
ठोकरें  खाने  की  ख़ातिर  दर  बदर जाती है रोज़ ।।

यह   उमीदों  का  परिंदा  भी  उड़े   तो   क्या  उड़े ।
बेरुखी  तो  बेसबब  पर  ही  क़तर जाती  है रोज़ ।।

कुछ    दरिंदों   की   तबाही , जुर्म   जिंदाबाद    है ।
आत्मा  तो  सुर्खियां  पढ़कर  सिहर जाती  है रोज़ ।।

बन   गया  चेहरा  कोई  उसके लिए  अखबार  अब ।
पढ़ शिकन की दास्तां दिल तक खबर जाती है रोज़ ।।

दे  रहा   है  वक्त   मुझको   इस  तरह   से  तज्रिबा ।
आँधियों  के  साथ  में  आफ़त  गुज़र जाती है रोज़ ।।

वस्ल  की  ख़्वाहिश  का  मंजर है सवालों से घिरा ।
देखिए  साहिल  को  छूनें  यह  लहर जाती है रोज़ ।।

क्या  कोई  रिश्ता  है उसका  पूछते  हैं अब  सभी ।
क्यूँ  इसी  कूचे  से वो शामो  सहर  जाती  है रोज़ ।।

            नवीन मणि त्रिपाठी 
            मैलिक अप्रकाशित 
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ग़ज़ल

*1212 1212 1212 1212*
सितम   की  आरजू   लिए   है   वक्त  आजमा  रहा ।
जो   हो   सका   नहीं   मेरा   वो    रास्ता  बता रहा ।।

अजीब  दास्ताँ  है  ये न्  कह   सका  न  लिख  सका।
ये  हाथ  मिल  गए   मगर  वो   फासला   बना   रहा ।।

है  हसरतों  की  क्या  ख़ता  उन्हें  जो  ये सजा मिली ।
मैं   कातिलों   का  रात   भर   गुनाह   देखता   रहा ।।

बड़ी   उदास   शब   दिखी  न   माहताब  था  कहीं ।
वो  कहकशां  सहर   तलक   हमें   ही   घूरता  रहा ।।

जो  सिलसिला चला  नही  उसी का जिक्र फिर सही ।
धुँआ  उठा   बहुत   मगर  न  आग   का   पता  रहा ।।

शजर  शजर  में   गुफ्तगूं  है बगवां  को   क्या  खबर ।
बगावतों   का    दौर   है   वो    कारवां   चला   रहा ।।

खुदा   समझ   सका   न   वो  अलग   हुईं   इबादतें ।
है   मजहबी    दयार   ये   खुदा   जुदा   जुदा  रहा ।।

नज़र  को   फेर   हमनशीं   गुजर  गया   करीब  से ।।
बदल  गए  मिज़ाज   सब  वफ़ा  का  सर झुका रहा ।

हवा  ने  रुख  बदल  दिया  तो  आग  भी  सुलग  गई ।
वतन  का  खैर  ख्वाह  ही  वतन  को  अब जला रहा ।।

हजार   घर   उजड़   गए   तमाम   लाश   जल  गयीं ।
सियासतों   के  नाम   पर  वो   मसअला  खड़ा  रहा ।।

               नवीन मणि त्रिपाठी 
             मौलिक अप्रकाशित 
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पूछिये मत क्यों हमारी शोखियाँ कम पड़ गईं

।। 2122 2122 2122 212 ।।

पूछिये मत क्यो  हमारी शोखियाँ कम पड़ गईं ।
जिंदगी  गुजरी  है  ऐसे आधियाँ कम पड़ गईं ।।

भूंख के मंजर से लाशों ने किया है यह सवाल ।
क्या ख़ता हमसे हुई थी रोटियां कम पड़ गईं ।।

जुर्म की  हर इंतिहाँ ने कर  दिया इतना असर ।
अब  हमारे मुल्क में भी बेटियां कम पड़ गईं ।।

मान् लें  कैसे उन्हें  है फिक्र जनता  की  बहुत ।
कुर्सियां जब से  मिली हैं झुर्रियां कम पड़ गईं ।।

इस तरह बिकने लगी है मीडिया कीसाख  भी।
जबलुटी बेटीकी इज्जत सुर्खियां कमपड़ गईं ।।

मैच  फिर खेला गया कुर्बानियो  को  भूलकर ।
चन्द  पैसों  के लिए रुसवाइयाँ कम  पड़ गईं ।।

मत कहो हीरो उन्हें  तुम वे खिलाड़ी मर चुके ।
दुश्मनों के बीच जिनकी खाइयां कमपड़ गईं ।।

हो  गया  नीलाम  बच्चों  की पढ़ाई  के  लिए ।
जातियों के फ़लसफ़ा में रोजियाँ कमपड़ गईं ।।

क्यो  शह्र जाने लगा है गांव का वह आदमी ।
नीतियों के फेर में आबादियां  कम पड़ गईं ।।

देखते  ही देखते  क्यो लुट गया सारा  अमन ।
कुछ लुटेरों  के लिए तो बस्तियां कम पड़ गईं ।।

सिर्फ  अपने ही  लिए जीने लगा  है  आदमी ।
देखिए अहले चमन में नेकियाँ कम पड़ गईं ।।

यह  सही  है बेचने वह  भी  गया  ईमान  को ।
गिर गया बाज़ार  सारी बोलियाँ कम पड़ गईं ।।

             --- नवीन मणि त्रिपाठी 
               मौलिक अप्रकाशित 
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