तीखी कलम से

मेरे बारे में

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जी हाँ मैं आयुध निर्माणी कानपुर रक्षा मंत्रालय में तकनीकी सेवार्थ कार्यरत हूँ| मूल रूप से मैं ग्राम पैकोलिया थाना, जनपद बस्ती उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ| मेरी पूजनीया माता जी श्रीमती शारदा त्रिपाठी और पूजनीय पिता जी श्री वेद मणि त्रिपाठी सरकारी प्रतिष्ठान में कार्यरत हैं| उनका पूर्ण स्नेह व आशीर्वाद मुझे प्राप्त है|मेरे परिवार में साहित्य सृजन का कार्य पीढ़ियों से होता आ रहा है| बाबा जी स्वर्गीय श्री रामदास त्रिपाठी छंद, दोहा, कवित्त के श्रेष्ठ रचनाकार रहे हैं| ९० वर्ष की अवस्था में भी उन्होंने कई परिष्कृत रचनाएँ समाज को प्रदान की हैं| चाचा जी श्री योगेन्द्र मणि त्रिपाठी एक ख्यातिप्राप्त रचनाकार हैं| उनके छंद गीत मुक्तक व लेख में भावनाओं की अद्भुद अंतरंगता का बोध होता है| पिता जी भी एक शिक्षक होने के साथ साथ चर्चित रचनाकार हैं| माता जी को भी एक कवित्री के रूप में देखता आ रहा हूँ| पूरा परिवार हिन्दी साहित्य से जुड़ा हुआ है|इसी परिवार का एक छोटा सा पौधा हूँ| व्यंग, मुक्तक, छंद, गीत-ग़ज़ल व कहानियां लिखता हूँ| कुछ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होता रहता हूँ| कवि सम्मेलन के अतिरिक्त काव्य व सहित्यिक मंचों पर अपने जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों को आप तक पहँचाने का प्रयास करता रहा हूँ| आपके स्नेह, प्यार का प्रबल आकांक्षी हूँ| विश्वास है आपका प्यार मुझे अवश्य मिलेगा| -नवीन

गुरुवार, 12 अक्तूबर 2017

कुछ अदा छलक उठी है कुछ नज़र से जाम भी

*212 1212 1212 1212*

आपकी ही रहमतों से मिल गई वो शाम भी ।
कुछ अदा छलक उठी है कुछ नज़र से जाम भी ।।
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ढूढ़िये न आप अब मेरे उसूल का चमन । 
दिल कभी जला यहां तो जल गया मुकाम भी ।।
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नज्र कर दिया गुलाब तो हुई नई ख़ता ।
हुस्न आपका बना गया उसे गुलाम भी ।
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जब चिराग जल गए तो फिर शलभ निकल पड़े ।
कुछ शमा के वास्ते हुए हैं कत्ले आम भी ।।
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मिल गयी नई किरन तो वक्त भी बदल गए ।
मुद्दतों के बाद कर गया कोई सलाम भी ।।
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पूछिये न इश्क में किसे मिला है क्या यहां ।
कुछ फकीर हो गए तो कुछ हुए निजाम भी ।।
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खो दिया गुरूर जो अना हुई जुदा जहाँ ।
कर सका वही वहाँ खुदा का एहतराम भी ।।
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दो पलों की दूरियां हैं जिंदगी की मौत से ।
कर रहे वो मुद्दतों का खास इंतजाम भी ।।
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कुछ निशानियाँ भी छोड़ कर चले गए कहाँ ।
पास रह गया मेरे है आपका कलाम भी ।।

             ---नवीन मणि त्रिपाठी
               मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल - मौत के बाद सभी फ़र्ज़ निभाने आये

ग़ज़ल
2122 1122 1122 22
यार  जितने  थे   नए  और   पुराने  आये ।
मौत  के बाद सभी  फर्ज  निभाने  आये ।।

कौन सुनता है यहां जिंदगी की आहट को ।
हौसले  जब  भी  बढ़े लोग मिटाने आये ।।

तीरगी  खूब  सलामत  है  तेरी  बस्ती में ।
वो  अदावत में चिरागों को बुझाने आये ।।

कुछ हुकूमत का नशा और नशा दौलत का ।
होश  उनके भी अभी तक न ठिकाने आये ।।

पेट की आग जलाती है कहाँ तक हम को ।
छोड़ कर  माँ को बहुत दूर कमाने आये ।।

शह्र में हम भी बड़े नाज़ से आये थे मगर ।
दर  बदर  ठोकरें  खाने  के ज़माने आये ।।

न्याय बिकता है यहां रोज़ तिज़ारत होती ।
उसके हिस्से में भी इफ़रात ख़जाने आये ।।

लूट लेते  हैं  अमन  शौक से कुर्सी ख़ातिर ।
वो  चुनावों  में  यहाँ  वोट  भुनाने  आये ।।

जात के नाम  पे छिनतीं  हैं यहां रोजी तक ।
फिर शिगूफ़ों से वो मरहम को लगाने आये।।

ये सियासत है जरा गौर से देखो आलिम।
मुल्क के लोग हैं जो मुल्क जलाने आये ।।

राम  के  साथ  चलाते  हैं  कई  धंधे  अब।
उनकी सीरत के सरे आम फ़साने आये ।।

ये  उमीदें न बिखर जाएं कहीं जनता की ।
कई  कानून   भरोसे   को  उठाने   आये ।।

आज इंसाफ की ख़ातिर हैं भटकती रूहें ।
ख़ाक क़ातिल के सबूतों को जुटाने आये ।।

         --- नवीन मणि त्रिपाठी 
             (मौलिक अप्रकाशित )

ग़ज़ल - पूछते लोग माज़रा क्या है

2122 1212 22
उस से मिलकर तुझे हुआ क्या है ।
पूछते   लोग   माजरा   क्या  है ।।

सच  बताने  पे  आप  क्यूँ   रोये ।
आइने  से  हुई   ख़ता   क्या  है ।।

है तबस्सुम का राज क्या उनके ।
आंख  में गौर  से  पढा  क्या  है ।।

अश्क़   हैं  बेहिसाब  हिस्से  में ।
ज़श्न  के  वास्ते   बचा   क्या  है ।।

इस  तरह  रोकिये  नहीं  मुझको ।
पूछिये  मत   मेरा  पता  क्या है ।।

आप  मतलब  की  बात  करते हैं ।
आपके  साथ   फायदा  क्या  है ।।

छोड़िये  बात  आप  भी  उसकी ।
उसकी बातों में अब रखा क्या है ।।

गर्म चर्चा  है  दिल  है  जलाने की ।
देखिए  फिर  धुँआ  उठा क्या है ।।

जी  रहा   हूँ   तमाम   गर्दिश  में ।
अब  सिवा  इसके  रास्ता क्या है ।।

चाँद   निकलेगा   उस   दरीचे  से ।
आसमाँ  को  तू  देखता  क्या है ।।

           नवीन मणि त्रिपाठी
        मौलिक अप्रकाशित 


ग़ज़ल - वफ़ा के साथ यकीनन है वास्ता मेरा

1212 1122 1212 22
अलग  है  बात  रखा नाम  बेवफा  मेरा ।
वफ़ा  के  साथ  यकीनन है वास्ता मेरा ।।

मेरे  गुनाह  का  चर्चा  है  शह्र  में काफी ।
तमाम   लोग  सुनाते  हैं   वाक्या   मेरा ।।

नज़र नज़र से मिली और होश खो बैठा ।
उसे भी याद है उल्फत का हादसा मेरा ।।

वो आसुओं से भिगोते ही जा रहे दामन ।
पढा जो खत है अभी,था वही लिखा मेरा ।

फ़िजा पेआज रकीबों का हो गया पहरा ।
बढ़ा  रही  हैं  हवाएं  भी  फ़ासला मेरा ।।

गरीब हूँ मैं शिकायतभी क्या करूँ उनकी ।
लड़ेगा  कौन रियासत  से मुकद्दमा मेरा ।।

अदालतों से मुहब्बत की बात मत कीजै ।
मेरे  ज़मीर   से  होगा  ये  फैसला  मेरा ।।

ये दिल सभाल के रखना,मेरीअमानत है ।
करेंगे  याद  कभी आप  फलसफा मेरा ।।

ज़माना  ढूढ  रहा  है  तेरी  निशानी को ।
कफ़न उठा के न चेहरा कहीं दिखा मेरा ।।

             --नवीन मणि त्रिपाठी 
            मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल - न जाने क्या हुआ मुझको जो तुझसे दिल लगा बैठे

तेरे  पहलू  में  आकर  हम  सुकूँ  अपना जला बैठे ।
न जाने क्या हुआ हमको जो दिल तुझसे लगा बैठे ।।

हवाएं भी मुख़ालिफ़ हो  गईं  तूफ़ान  के जैसी ।
कई  थीं  ख्वाहिशें  अपनी  हवाओं  में  उड़ा  बैठे ।।

हुई  है  आज महफ़िल  में  तेरेआने  की  फिर चर्चा ।
यहां पलकें उमीदें दिल जिगर सब कुछ बिछा बैठे ।।

बड़ी उलझी कहानी हो पढूं मैं खाक क्या तुमको ।
मेरी  खामोश  चाहत  पर  सुना  पहरा  लगा बैठे ।।

बड़ी  क़ातिल  निगाहें  हैं  बड़ी कमसिन  अदाएं  हैं ।
तेरी  जुल्फों   के  साये  में , मुकद्दर  आजमा  बैठे ।।

गज़ब ये हुस्न का जलवा लबों पर देखकर जुम्बिश ।
तुम्हारी  शोखियों  पर  आरजू  का  घर बना बैठे ।।

न  पूछो  तुम  कहाँ तक  देख लेती हैं यहां नज़रें ।
तसव्वुर   में   तुम्हारे  हुस्न  से  पर्दा   उठा  बैठे ।।

भरी बोतल सी छलकी जो तुम्हारी आंख से मदिरा ।
बचा  जो  होश  थोड़ा  था  उसे भी हम लुटा बैठे ।।

              -- नवीन मणि त्रिपाठी

ग़ज़ल - चेहरा नहीं पढ़ा गया अब तक उजास में

221  2121  1221  212

ठहरी मिली है  ज़िंदगी  उनके  गिलास में । 
मिलते  कहाँ  हैं लोग भी  होशो हवास में ।।

देकर  तमाम  टैक्स   नदारद  है   नौकरी ।
अमला लगा रखा है उन्होंने  विकास  में ।।

सरकार सियासत में निकम्मी  कही  गई ।
रहते  गरीब  लोग  बहुत  भूँख प्यास  में ।।

बेकारियों   के  दौर से गुजरा हूँ  इस  कदर ।
घोड़ा  ही  ढूढता   रहा  ताउम्र  घास  में ।।

यूँ ही तमाम  कर लगे हैं जिंदगी पे आज ।
रहना  हुआ  मुहाल  है अपने  निवास में ।।

कितने नकाब डाल के मिलने लगे हैं लोग ।
चेहरा नहीं  पढ़ा गया अब तक उजास में ।।

दौलत की ख़ासियत को जरा देखिए हुजूर ।
उलझे  हजार  हुस्न यहां  खास  खास  में ।। 

खुशबू सी आ रही है हवाओं से  बेहिसाब ।
शायद  बहार  होगी  कहीं  आस  पास में ।।

जबसे खुला है मैकदा उनकी गली के पास ।
निकले  शरीफ़  लोग भी महंगे लिबास  में ।।

कड़वी ज़ुबान है तो उसे  भी  सलाम  कर ।
कीड़ें  पड़े  तमाम  हैं अक्सर  मिठास  में ।।

कैसा  हवस  का दौर  है कैसे पढ़े हैं लोग ।
होते  हैं फेल  इश्क़ की पहली कलास में ।।

यूँ  ही  मिली नज़र  थी इरादा भी नेक था ।
मुज़रिम बना गया है कोई फिर कयास में।।

            --नवीन मणि त्रिपाठी
            मौलिक अप्रकाशित

दोहे

दोहे

कामी कुछ बाबा हुए कलयुग  हुआ असीम।
कुछ तो  आशाराम हैं,कुछ  हैं  राम  रहीम।।

हनीप्रीत  जोगन बनी ,अद्भुत उसकी  प्रीत ।
काम वासना बाँट कर,नित नित बदले रीत।।

राधे  माँ  के द्वार  पर, निशदिन  बरसे नेह ।
जाकी जैसी पोटली , ता  पर    तैसी  गेह ।।

कई  तपस्वी  ढूढते ,फूलों  का  मकरन्द ।
अब  रावण  के भेष में, मिलते नित्यानंद ।।

ग़ज़ल

*221  1221  1221  122*

जबसे  खुली  ये आपकी  दूकान  है  बाबा ।
दौलत  पे नज़र आपकी  पहचान  है बाबा ।।

गर  होते  यहां  रोग  सभी  योग से  अच्छे ।
फिर क्यूँ दवा के नामका फरमान है बाबा ।।

काला है  ये मन आपका  काली  है  कमाई ।
महंगा हुआ क्यों आपका ये  ज्ञान है बाबा ।।

अनशन में दिखीआप के हर योगकी ताकत ।
कमजोर बहुत आपकी  ये  जान है  बाबा ।।

सलवार  पहन भाग गए  आप   समर   से ।
निर्दोष   मरे आपका   सम्मान   है   बाबा ।।

इस  राम रहीमा की भी  करतूत अजब है ।
अब  भेड़िया के भेष  में  शैतान  है  बाबा ।।

आशा  का  है  वो राम मगर  काम   बुरा है ।
अपने ही करम से अभी अनजान है बाबा ।।

आरोप  है  गुरुदेव की हत्या में है शामिल ।
कहता है  बड़े नाज़  से  इंशान  है  बाबा ।।

                    ---नवीन मणि त्रिपाठी

ग़ज़ल -था बारिशों का दौर समंदर मचल गया

*221  2121  1221  212*

सारा  चमन गुलाब था अश्कों  में ढल गया ।
था  बारिशों  का  दौर समंदर मचल  गया ।।

रुसवाईयां  तमाम  थीं  दिल में  मलाल  थे ।
देखा जो हुस्न आपका पत्थर पिघल गया ।।

खुशबू   बनी  हुई  है  अभी  तक दयार  में ।
महबूब  मेरा ख्वाब  में आकर  टहल  गया ।।

कैसा नशा था इश्क़ में मदहोशियों के बीच ।
जो भी थे दफ़्न राज़ वो पल में उगल गया।।

जब  मैं जला तो लोग बहुत जश्न में मिले ।
जैसे  किसी नसीब का सिक्का उछल गया ।।

कहता था है ये आग का दरिया न इश्क कर। 
सुनता  हूँ  चैन  भी  तेरा है आजकल गया।। 

कच्ची  सी  बस्तियोंं में हैं  सस्ते जवाहरात ।
कीचड़ के आस पास में देखा कंवल गया ।।

महफ़िलमें क्या नज़र मिली जोआपसे हुजूर।
मुद्दत  के  बाद दिल भी हमारा बहल गया।।

उसने  कहा  था   साथ  निभाएंगे  उम्र  भर ।
इंसान  चन्द  रोज  में  कितना  बदल  गया ।।

मिलती  कहाँ  दुआ  है  मुहब्बत  के वास्ते ।
आई कभी खुशी तो दिवाला निकल गया ।।

वो  जिस्म  था  कि  आग यही  सोचते  रहे ।
जब  भी गया करीब  लहू तक उबल गया ।।

             ,--नवीन मणि त्रिपाठी
                 मौलिक अप्रकाशित


ग़ज़ल -कौन कैसा उड़ रहा देखा करो

2122  2122  212
इस तरह बे फिक्र मत  निकला  करो ।
कुछ ज़माने को भी अब समझा करो।।

है  मुहब्बत   से  सभी  की  दुश्मनी।
ज़ालिमों से मत कभी उलझा  करो ।।

फिर  सितारे  टूटकर  गिरते  मिले ।
आसमा पर भी नज़र  रक्खा करो ।।

कुछ   परिंदे   हो  गए   बेख़ौफ़  हैं ।
कौन  कैसा उड़  रहा  देखा   करो ।।

दाग  दामन  पर लगे  कितने  यहां ।
आइनो  से  भी  कभी  पूछा  करो ।।

वक्तपर अक्सर मुकर जाते हैं लोग ।
आदमी  की बात  को परखा करो ।।

याद रखना है अगर  उसका  सितम ।
दिल के पन्नों में सितम लिक्खा करो।।

लोग   पलकें   हैं   बिछाए   राह   में ।
बेसबब  यूँ   ही  नहीं   परदा   करो ।।

है  अगर  कुछ  भी  सुकूँ  से वास्ता ।
जुर्म   के  बाबत  नहीं   चर्चा  करो ।।

हम  यकीं  करने  लगेंगे  आप  पर ।
आप  मुद्दों  पर  कभी  ठहरा करो ।।

लुट  न  जाए यह खज़ाना हुस्न का ।
उम्र की  दहलीज  पर  पहरा  करो ।।

   नावीन मणि त्रिपाठी
      मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल - चाँद बनकर वो निखर जाएंगे

2122 1122 22
चाँद बनकर वो  निखर  जाएंगे ।
शाम   होते   ही  सँवर  जाएंगे ।।

मुझको मालूम है फ़ितरत उनकी ।
हैं  जिधर आप   उधर   जाएंगे ।।

जख्म परदे में ही रखना अच्छा ।
देखकर  लोग   सिहर   जाएंगे ।।

छेड़िये  मत  वो  कहानी मेरी ।
दर्द   मेरे   भी   उभर    जाएंगे ।।

घूर  कर   देख रहे  हैं  क्या अब  ।
आप  नजरों   से  उतर  जाएंगे।।

वक्त  रुकता  नहीं  है दुनिया में ।
दिन  हमारे  भी  सुधर  जाएंगे ।।

क्या  पता था कि  जुदा होते ही ।
इस  तरह  आप  बिखर जाएंगे ।।

ये   मुहब्बत    है   इबादत   मेरी ।
एक दिन दिल मे ठहर में जाएंगे ।।

इश्क़ पर बात अभी क्या करना ।
इश्क  पर   आप  मुकर जाएंगे ।।

जिद मुनासिब  कहाँ है पीने की ।
आप  तो  हद  से गुजर जाएंगे ।।

बज्म में आ  गए  तो  रुकिए भी।
आज  की  रात  किधर  जाएंगे ।।

               नवीन मणि त्रिपाठी
             मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल-सियाह ज़ुल्फ़ के साये में शाम हो जाये ।

1212 1122 1212 22*
ये ख्वाहिशें हैं कि दिल तक मुकाम  हो जाये ।
सियाह  ज़ुल्फ़   के  साये  में  शाम  हो जाये ।।

हैं मुन्तज़िर सी ये आंखे कभी तू मिल तो सही।
नए   रसूख़   पे   मेरा   कलाम    हो    जाये ।।

बड़े   गुरुर   से   उसने   उठाई    है    बोतल ।
ये  मैकदा  न  कहीं   फिर  हराम   हो   जाये ।।

फिदा है आज तलक वो भी उस की सूरत पर ।
कहीं  न  वो  भी  सनम  का  गुलाम हो जाये ।।

अदा  में  तेज  हुकूमत   की  ख्वाहिशें   लेकर ।
खुदा  करे  कि  वो  दिल  का निजाम हो जाए ।।

किसी  की  बज्म  में आना  है एक दिन उसको ।
मेरे   नसीब   में   वह     एहतराम    हो   जाये ।।

जफ़ा  की  राह  पे  चलने  लगीं   वफ़ाएँ  सब  ।
चलो वफ़ा  का  ये   किस्सा  तमाम  हो  जाये ।।

नावीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल -पता वह चाँद का भी ढूढता है

1222 1222 122
मेरी पहचान खारिज़  कर रहा है ।
जो  मुद्दत  से  मुझे  पहचानता है ।।

खुशामद का हुनर बख़्शा  है रब ने ।
खुशामद  से वो  आगे बढ़ रहा है ।।

जतन कितना करोगे आप  साहब ।
ये भ्रष्टाचार अब  तक फल रहा है ।।

यकीं होता नही जिसको खुदा पर ।
वही   इंसां  खुदा  से   माँगता   है ।।

उसे   ही  डस रहें हैं सांप  अक्सर ।
जो सापों  को  घरों  में पालता है ।।

गया मगरिब में देखो  आज सूरज ।
पता  वह  चाँद  का  भी ढूढता है ।।

मदारी  के  लिए   जो  है  कमाऊ।
वही   बन्दर  हमेशा  नाचता   है ।।

गरीबी में  हुआ जीना है मुश्किल ।
कोई  बाबा  को  बेटी  बेचता  है ।।

नई   सूरत  को  अक्सर  ढूढते  हैं।
यही इंसानियत का फलसफा है ।।

है उनका  दूर  ही  रहना   मुनासिब ।
कहाँ  उन  से   हमारा  वास्ता  है ।।

न जाने क्या  हुआ  है  आदमी को ।
पराये  माल  को   ही  देखता   है ।।

         --- नावीन मणि त्रिपाठी 
             मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल - वह मुहब्बत में फ़ना हो जाएगा

2122 2122 212
मत  कहो हमसे  जुदा  हो  जाएगा ।
वह  मुहब्बत  में  फ़ना हो  जाएगा ।।

इश्क  के  इस दौर में दिल आपका ।
एक  दिन  मेरा   पता  हो  जाएगा ।।

धड़कनो   के   दरमियाँ  है  जिंदगी ।
धड़कनो का सिलसिला हो जाएगा ।।

इस  तरह  उसने  निभाई  है कसम ।
वह   हमारा    देवता   हो  जाएगा ।।

ऐ   दिले  नादां  न  कर  मजबूर  तू ।
वो  मेरी ज़िद पर ख़फ़ा हो जाएगा ।।

पत्थरो को  फेंक कर  तुम  देख लो ।
आब  का  ये कद  बड़ा हो जाएगा ।।

मत निकलिए इस तरह से बेनकाब ।
फिर  चमन में  हादसा  हो  जाएगा ।।

अब अना से बढ़  रहीं  नज़दीकियां ।
रहमतों   से   फ़ासला  हो  जाएगा ।।

                  -- नवीन मणि त्रिपाठी

ग़ज़ल - ज़रा सम्भल के चलो।

*1212  1122  1212  22*
नई  नई  ये  हुकूमत  जरा  सँभल  के  चलो ।
बढ़ी हुई है लियाकत  जरा सँभल  के चलो ।।
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सुना है मुल्क में  खाकर वो पाक  ही  भजते ।
है आप की भी शिकायत जरा सँभल के चलो ।।

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गुनाह  करके  मिटाना हुआ  बहुत  मुश्किल।
नहीं मिलेगी जमानत जरा  सँभल  के चलो ।।

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वो कह गये   हैं  चलाएंगे  हम भी बुलडोजर ।
ये देखिए तो हिमाकत जरा संभल के चलो ।।

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न जिक्र कर  न  ले पंगा  कभी  भी  औरत  से ।
मिली  है खूब हिदायत  जरा  सँभल  के चलो ।।

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कई.  मुकाम  थे  बाबा  को देखिए   हासिल  ।
मिटी  तमाम  नफ़ासत  जरा  सँभल  के चलो ।।

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तलाक   तीन    से   पर्दा   उठा   दिया   उसने ।
तलाक पर है कयामत  जरा  सँभल  के चलो ।।

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घरों   में    नोट   दबाकर   नही.  रखो   वरना ।
है  जोरदार   नदामत   जरा  सँभल के चलो ।।

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उन्हें   है  वोट  से  मतलब  नजर  उसी पर  है । 
है जातिवाद सलामत  जरा  सँभल  के  चलो ।। 

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उगल रहे  हैं  वो  लारा  को  और  चारा   भी ।
उजड़  गई  है  रियासत  जरा  सँभल के चलो ।।

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वो  हेकड़ी  हुई  है  गुम  जो  पत्थरों   की   थी ।
बड़ी है सख़्त अदालत  जरा  सँभल  के  चलो ।।

        नावीन मणि त्रिपाठी 
      मौलिक अप्रकाशित

मंगलवार, 5 सितंबर 2017

ग़ज़ल - आप क्या हैं इसे जानता कौन है

212 212 212 212
पूछिये  मत   यहां   गमज़दा   कौन   है ।
पूछिये    मुद्दतों    से   हँसा   कौन   है ।।

वो तग़ाफ़ुल  में  रस्में  अदा  कर  गया ।
कुछ  खबर  ही  नहीं  लापता कौन है ।।

घर बुलाकर  सनम  ने बयां  कर दिया ।
आप आ  ही गये तो  ख़फ़ा  कौन  है ।।

इस तरह कोई बदला है  लहजा  कहाँ ।
आपके   साथ  में   रहनुमा   कौन  है ।।

आज तो बस  सँवरने  की  हद  हो गई ।
यह  बता  दीजिए  आईना   कौन   है ।।

अश्क़ आंखों से छलका तो कहने लगे ।
ढल   गई  उम्र  अब   पूंछता  कौन  है ।।

यूँ   भटकता  रहा  उम्र  भर   इश्क  में ।
पूछता   रह   गया   रास्ता   कौन    है ।।

मैंने ख़त में उसे जब ग़ज़ल लिख दिया ।
फिर  सवालात  थे  ये  लिखा  कौन है ।।

दीजिये  मत  खुदा  की  कसम बेसबब ।
अब  खुदा  को  यहां   मानता  कौन है ।।

है  जरूरी  तो  घर  तक   चले   आइये ।
आप  क्या  हैं  इसे  जानता   कौन   है ।।

             -- नवीन मणि त्रिपाठी
              मौलिक अप्रकाशित

शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

ग़ज़ल - शायद कोई नशा है यहां इंकलाब में

221 2121 1221 212

आ   जाइये   हुजूर   जरा  फिर  हिजाब  में ।
ठहरी   बुरी   नजर  है  यहां  माहताब  में ।।

बच्चों  की  लाश पर है तमाशा  जनाब  का ।
औलाद  खो   रहे  किसी  खानाखराब  में ।।

अंदाज आपके  हैं बदलते  अना  के  साथ ।
शायद  कोई   नशा  है  यहां  इंकलाब  में ।।

सत्ता मिली  जो आपको  चलने लगे  हैं दौर ।
डूबे   मिले हैं  आप  भी  महंगी  शराब  में ।।

खामोशियों  के  बीच  जफा  फिर जवाँ हुई ।
आंखों  ने अर्ज कर  दिया  लुब्बे लुआब में ।।

यूँ  ही किया  था जुर्म वो दौलत के नाम पर ।
दो  गज जमीं हुई  है मयस्सर  हिसाब  में ।।

पूछा  वतन का हाल मियां खत को भेजकर।
आया न कोई खतभी अभी तक जबाब में।।

अफसर बिके  हैं  खूब  यहां आंख  बन्द है ।
धब्बा  लगा  रहा  है  कोई  आफ़ताब   में ।।

सारा  यकीन  ढह  गया   हालात  देखकर ।
मिलने  लगे  हैं  जुर्म  भी  अपने शबाब में ।।

रहबर  तेरा  गुनाह  भी  दुनियां को है पता ।
छुपता  है  देर तक  नहीं  चेहरा नकाब  में ।।

उतरा  है  रंग  आपका  तीखे  लगे  सवाल ।
हड्डी  मिली  है आपको  जब से कबाब  में ।।

              -- नवीन मणि त्रिपाठी 
               मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल --वो तेरा छत पर बुलाकर रूठ जाना फिर कहाँ

2122 2122 2122 212
वो  तेरा  छत  पर   बुलाकर  रूठ  जाना   फिर  कहाँ ।
वस्ल  के एहसास  पर   नज़रें   चुराना  फिर  कहाँ ।।

कुछ ग़ज़ल में थी कशिश कुछ आपकी आवाज थी ।
पूछता  ही   रह   गया  अगला  तराना  फिर  कहाँ ।।

आरजू   के   दरमियाँ  घायल  न   हो   जाये   हया ।
अब   हया  के   वास्ते  पर्दा   गिराना  फिर   कहाँ ।।

कातिलाना   वार   करती   वो  अदा   भूली   नहीं ।
शह्र  में  चर्चा   बहुत  थी अब निशाना फिर कहाँ ।।

तोड़ते  वो  आइनों   को   बारहा   इस   फिक्र  में । 
लुट  गया  है  हुस्न  का  इतना खज़ाना फिर कहाँ ।।

था   बहुत   खामोश   मैं  जज़्बात  भी  खामोश थे ।
पढ़  लिया  उसने  मेरे दिल  का फ़साना फिर कहाँ ।।

खो  गए  थे  इस  तरह  हम  भी  किसी  आगोश में ।
याद  आया  वो  ज़माना   पर  ठिकाना   फिर कहाँ ।।

उम्र  की  दहलीज  पर   यूँ  ही   बिखरना  था   मुझे ।
वो  लड़कपन ,वो  जवानी, दिन  पुराना  फिर  कहाँ ।।

ढल  चुकी  हैं  शोखियाँ  अब  ढल  चुके  अंदाज  भी ।
अब   हवाओं   में   दुपट्टे    का  उड़ाना   फिर   कहाँ ।।

हुस्न   की  जागीर  पर  रुतबा  था  उसका   बेमिसाल।
झुर्रियों  की  कैद  में   अब  भाव   खाना  फिर  कहाँ ।।

मैकदों   की  राह  से  ग़ुज़रा   तो   ये   आया   खयाल ।
शरबती  आंखों  से  अब  पीना   पिलाना  फिर   कहाँ ।।

            नवीन मणि त्रिपाठी
            मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल - जिस्म था क्या मेरा खेलने के लिए

इक  नज़र  क्या  उठी  देखने  के लिए ।
चाँद  छिपता  गया  फासले  के  लिए ।।

कोई   सरसर   उड़ा  ले   गई  झोपड़ी ।
सोचिये  मत  मुझे   लूटने    के  लिए ।।

मौत मुमकिन  मेरी  उसको आना ही है ।
दिन  बचे   ही  कहाँ   काटने  के  लिए ।।

जहर  जो  था   मिला  आपसे  प्यार में ।
लोग    कहते   गए   घूँटने   के   लिए ।।

रात  आई   गई   फिर   सहर  हो   गई ।
याद   कहती  रही  जागने   के    लिए ।।

जब   रकीबो   से  चर्चा   हुई   आपकी ।
फिर  पता  मिल  गया  ढूढने  के  लिए ।।

सज के आए हैं महफ़िल में  मेरे सनम ।
इक  नज़र  भर  मेरी  फेरने  के   लिए ।।

कहकशां   से   भी  आवाज़ आई   बहुत ।
चाँद  क्यों  छल   रहा   जीतने के  लिए ।।

यह  बताकर  जरा   तोड़िये दिल  मेरा ।
जिस्म  था  क्या  मेरा  खेलने  के लिए ।।

ग़ज़ल - कसम से वफ़ा की फ़ज़ीहत न होती

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अगर  मेरे  दिल  पे  हुकूमत  न  होती ।
तो फिर आपकी भी रियासत न होती ।।

पलट जाती कश्ती  भी  तूफां  में  मेरीे ।
मेरे   पास  उनकी  नसीहत  न  होती ।।

बहुत  कुछ  बदलते फ़िजा के  नज़ारे ।
अगर आपकी कुछ सियासत न होती ।।

जरा सा भी वो थाम  लेते  जो  दामन ।
यहां  आसुओं की  इज़ाफ़त  न होती ।।

वो  मेरा   सुकूँ  भी  मेरे  साथ   रहता ।
अदाओं  में  थोड़ी  शरारत  न  होती ।।

वो इंसाफ करता न अब तक  जहां में ।
कहीं  भी खुदा की  इबादत न  होती ।।

बरसते न बादल भी प्यासी जमीं पर ।
अगर आपकी कुछ इज़ाज़त न होती।।

मुहब्बत के  रिश्ते  न  होते  सलामत ।
तो  फिर ताज जैसी इमारत न होती ।।

यूँ लहरा के जुल्फ़े  न  करतीं नुमाइश ।
तो अहले  चमन  में कयामत न होती ।।

तुम्हें   बेवफा  मान  लेते   जो   पहले ।
कसम से वफ़ा की फ़जीहत  न होती ।।

          -- नवीन मणि त्रिपाठी

ग़ज़ल - माना कि तेरे दिल की इनायत भी बहुत थी

221  1221 1221 122

माना कि तेरे दिल  की  इनायत  भी बहुत थी ।
पर साथ इनायत के हिदायत  भी  बहुत थी ।।

आते  थे  वो  बेफिक्र  मेरे   शहर  में  अक्सर ।
तहजीब  निभाने  की  रवायत  भी  बहुत थी ।।

महंगे  मिले  हैं  लोग  मुहब्बत   के  सफ़र   में ।
यह बात अलग है  कि  रिआयत भी  बहुत  थी।।

चेहरे   को   पढा  उसने कई बार   नज़र   से ।
महफ़िल में तबस्सुम की किफ़ायत भी बहुत थी ।।

वो  हार  गए  फिर  से   अदालत   में   सरेआम ।
हालाकि  नजीरों  की  हिमायत  भी  बहुत  थी ।।

छूटी  हैं  किताबें   भी  वही   उस  से  अभी  तक ।
जिस पर लिखी कुरआन की आयत भी बहुत थी ।।

क्यों   पूछ  रहे  हैं   मेरे  दिल  का   वो   फ़साना ।
उनको तो  मुहब्बत  से  शिकायत भी  बहुत  थी ।।

            ---नवीन मणि त्रिपाठी
             मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल --बदलनी अब तुम्हें सरकार है क्या

1222 1222 122

नया    चेहरा   कोई   दरकार  है  क्या ।
बदलनी अब  तुम्हें  सरकार  है  क्या ।।

बड़ी मुश्किल से रोजी मिल  सकी  है ।
किया  तुमने  कोई  उपकार  है  क्या ।।

सुना  मासूम  की  सांसें   बिकी    हैं ।
तुम्हारा  यह  नया  व्यापार  है क्या ।।

इलेक्शन लड़ गए तुम  जात  कहकर ।
तुम्हारी   बात   का  आधार  है  क्या ।।

यहां  पर  जिस्म  फिर  नोचा गया है ।
यहां  भी  भेड़िया   खूंखार  है  क्या ।।

बड़ी  शिद्दत  से  मुझको  पढ़ रहे हो ।
मेरा चेहरा  कोई  अखबार  है  क्या ।।

हिजाबों   में  खरीदारों  की   रौनक ।
गली में  खुल  गया बाज़ार  है क्या ।।

बहुत  दिन  से कसीदे  लिख  रहे हैं ।
कलम  में आपके  भी धार  है  क्या ।।

कदम  उसके  जमीं  पर अब नहीं हैं ।
हुआ कुछ चांद  का  दीदार  है क्या ।।

तबस्सुम    पर    तेरे   हैरत   हुई   है।
गमों  की  हो   गई  भरमार  है क्या ।।

महज मजहब मेरा  पूछा  था  उसने ।
कहा   तू  देश  का  गद्दार   है  क्या ।।

            नवीन मणि त्रिपाठी
           मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल -मेरी आशिक़ी क्या अमानत नहीं है

122 122 122 122
ख़यानत  की   खातिर  मुहब्बत नहीं है ।
मेरी  आशिकी क्या  अमानत  नहीं  है ।।

नज़र  से हुई  थी  ख़ता  दफ़अतन  जो ।
हमें  उस  ख़ता  से  शिकायत  नहीं है ।।

मिटा   कर   चले   जा   रहे   हैं  उमीदें ।
बची  आप  में  भी  शराफ़त   नहीं   है ।।

चले  आइये  बज़्म   में  रफ़्ता   रफ़्ता  ।
मेरी  आप  से  अब  अदावत  नहीं  है ।।

यकीं कर मेरा   रूठ   कर   जाने  वाले।
मेरे दिल की अब तक इजाज़त नहीं है।।

तेरे  दर  पे आना  मुनासिब कहाँ  अब ।
वहां  आशिकों  की  निज़ामत नहीं  है ।।

शुरूआत  है  ये   बुरे  दिन की  शायद।
दुआवों  से  अब  तो इज़ाफ़त  नहीं है ।।

गुजर जाएंगे मुफ़लिसी के ये  दिन भी ।
बुरा  वक्त  भर  है  कयामत  नहीं   है ।।

करेगा वो  इंसाफ  जुल्मो  सितम  का ।
तुम्हारी   वहां   तो   हुकूमत  नहीं  है ।।

न  उम्मीद रखिये  वफ़ा  की  यहां पर ।
यहां तो  ख़ुदा  की  अक़ीदत  नहीं  है ।।

उसे दिल न देना है कमसिन जिगर  वो ।
मुहब्बत  की  कोई हिफ़ाज़त  नहीं है ।।

जिधर   फेरते  हैं  अदा   से  वो  नज़रें ।
उधर  कोई   बस्ती   सलामत  नहीं  है।।

        ---नवीन मणि त्रिपाठी
          मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल - भूँखे हैं नौजवान कटोरा है हाथ में

221  2121  1221  212
इतनी  जफ़ा  शबाब  पे  लाया  न  कीजिये ।
मुझको   मेरा  वजूद बताया  न   कीजिये ।।

भूखें   हैं   नौजवान   कटोरा   है  हाथ   में ।
थाली किसी के हक़ की हटाया न कीजिये ।।

बेटा  पढा  लिखा  के  वो  नीलाम  हो गया ।
कोटे   की  राजनीति   कराया  न  कीजिये ।।

अब न्याय क्या करेंगे कभी आप  मुल्क  से ।
झूठी तसल्लियाँ  तो  दिलाया   न  कीजिये ।।

कुर्सी  पे  जात  ढूढ  के चेहरा  दिखा  दिया ।
गन्दा  है जातिवाद  सिखाया  न  कीजिये ।।

वो जल रहाहै आजभी मण्डल की आग से ।
देकर  हवाएं   और  जलाया  न  कीजिये ।।

चेहरा बदल  बदल के  नहीं वोट  मांगना ।
अपनी हकीकतों को छुपाया न कीजिये ।।

कैसे   फरेबियों   का    यहां  राष्ट्रवाद   है ।
करते कहाँ हैं न्याय दिखाया  न्  कीजिये ।।

उनकी  गरीबियों  से  उन्हें  वास्ता ही क्या।
अब लाली पॉप दे के फँसाया न् कीजिये ।।

जीते  चुनाव  आप   सवर्णो  के  नाम  पर ।
संसद  में  इनका  दर्द बढ़ाया  न  कीजिये ।।

वादा किया है पास करेंगे वो बिल भी आप ।
कोटे  से  मुल्क  और  मिटाया  न  कीजिये ।।

          नावीन मणि त्रिपाठी
        मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल -बस रात भर की बात थी

2212 2212 2212 2212 

बस रात भर की बात थी , फिर भी रहा पहरा तेरा ।
ऐ  चाँद  तेरी  बज़्म  में  कायम  रहा  रुतबा  तेरा ।।

वो  तीरगी  जाती  रही  रोशन  लगी हर शब मुझे ।
मेरे तसव्वुर  में कभी जब  अक्स  ये  उभरा तेरा ।।

टूटा हुआ तारा था इक हँसता रहा क्यूँ  कहकशां ।
यूँ  ही  जमीं  से  देखता मैं  रह गया  लहज़ा तेरा ।।

देकर गई  है मुफ़लिसी ,कुछ  तज्रिबा भी कीमती ।
मुझको अभी तक याद है ,बख्शा हुआ सदक़ा तेरा।।

है  जिक्र  तेरे  हुस्न  का  ,बाकी  कोई  चर्चा  नहीं ।
है चार  सू  खुशबू  तेरी  छाया  रहा  जलवा  तेरा ।।

रानाइयों  के  फेर में  हम  भी  हरम  में  आ  गए ।
देखा  हया   के  वास्ते  गिरता  रहा  परदा   तेरा ।।

सारा  ज़माना हो  गया दुश्मन  मेरा इस बात  पर ।
कातिल  बनाकर  उम्र भर जारी रहा फ़तबा तेरा ।।

नज़रों की थी ग़फ़लत या फिर वह ख्वाब था मेरा कोई ।
महफ़िल  में चर्चा  है बहुत  आकर  चला .जाना तेरा ।।

मायूस    है    सारा   चमन   मायूस   दीवाने   हुए ।
जब  से  दुपट्टे  में  छिपा  है  चाँद  सा  चेहरा  तेरा ।।

खामोशियों  के बीच से उठने  लगे हैं कुछ सवाल ।
वो मिन्नतें  करता  गया पर दिल नहीं पिघला तेरा ।।

            नवीन मणि त्रिपाठी
           मौलिक अप्रकाशित 
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शनिवार, 29 जुलाई 2017

ग़ज़ल ---बाकी अभी है और फ़ज़ीहत कहाँ कहाँ

221 2121 1221 212
लेंगे   हजार   बार   नसीहत   कहाँ  कहाँ ।
बाकी अभी है और  फ़जीहत कहाँ कहाँ ।।

चलना बहुत  सँभल  के ये  हिन्दोस्तान है ।
मिलती यहां सभी को हिदायत कहाँ कहाँ।।

मजहब कोई बड़ा है तो इंसानियत का है ।
पढ़ते  रहेंगे  आप  शरीअत  कहाँ  कहाँ ।।

वादा  किया  हुजूर  ने  बेशक  चुनाव  में ।
यह बात है अलग कि इनायत कहाँ कहाँ।।

बदलेंगे लोग ,सोच बदल दीजिये जनाब ।
रक्खेंगे आप इतनी  अदावत  कहाँ कहाँ ।।

ईमान   बेचता   है   यहाँ   आम   आदमी ।
करते   रहेंगे  आप   हुकूमत  कहाँ  कहाँ ।।

कैसे   रिहा  हुआ  है  यही  पूछते  हैं सब ।
होती  है पैरवी में किफ़ायत  कहाँ  कहाँ ।।

है देखना तो देखिए  मुफ़लिस की जिंदगी ।
मत देखिए हैं लोग  सलामत  कहाँ  कहाँ ।।

सहमें  हुए  हैं चोर  हकीकत  ये  जानकर ।
आएगी इक नज़र से कयामत कहाँ कहाँ ।।

हालात  देख  के वो  समझने लगे  हैं  सब ।
ये  ग़म कहाँ कहाँ  ये  मसर्रत कहाँ  कहाँ।।

चोरों  को   भी  तलाश  है  ईमानदार  की ।
ढूढा ज़मीर  में  है  सदाक़त  कहाँ  कहाँ ।।

           नवीन मणि त्रिपाठी 
         मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल - तू सलामत रहे यूँ छोड़ के जाने वाले

2122 1122 1122  22
मेरी   आबाद   मुहब्बत  को  मिटाने  वाले ।
तू  सलामत   रहे   यूँ  छोड़  के  जाने वाले ।।

चन्द   रातों   की  मुलाकात  न्   सोने  देगी ।
याद   आएंगे  बहुत   नींद  चुराने   वाले ।।

कितना बदलाहै जमाने का चलन देख जरा।
तोड़  जाते  हैं ये  दिल ,प्यार  निभाने वाले।।

इस तरह रूठ के जाने की जरूरत  क्या थीं।
यूँ  किताबों  में  गुलाबों  को  छिपाने  वाले ।।

चार अशआर लिखे थे जो कभी ख़त में तुझे।
क्या मिला तुझको मेरे ख़त को जलाने वाले ।।

आज निकले वो गली से तो छुपा कर चेहरा ।
मेरी   तस्वीर  को  आंखों में सजाने  वाले ।।

रुख बदलते ही हवाओं ने सितम क्या ढाया ।
खो   गए   लोग   मेरे  नाज़ उठाने  वाले ।।

प्यार  का मैं  हूँ  मुसाफिर न् मुझे रोको तुम ।
है   कई   लोग  यहां   राह  बताने    वाले ।।

जिंदगी  भीड़   में   गुजरे  ये   तमन्ना  मेरी ।
मेरी  तन्हाई   में  आते   हैं  सताने    वाले ।।

कोई सुकरात को ,शंकर तो कोई  मीरा को।
ज़हर  के  साथ  मिले  लोग  पिलाने  वाले ।।

इश्क़ बिकता है खुले आम जरूरत पे यहां ।
शह्र   में   खूब    हैं  दूकान   चलाने  वाले ।।

           नवीन मणि त्रिपाठी 
            मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल ----मर रहा आंखों का पानी देखिए

बात    उसकी    आसमानी    देखिए ।
मर  रहा  आंखों   का  पानी  देखिए ।।

फिर किसी फारुख की गद्दारी  दिखी ।
बढ़    रही    है   बदजुबानी  देखिए ।।

पत्थरों   से   बाज  वो   आते   नही ।
कायरों    की    बदगुमानी   देखिए ।।

कौन   कहता  डर  गया  है   रोमियो ।
रास्तों    पर     छेड़खानी     देखिए ।।

वह   नकाबों  की  घुटन  से  ऊबकर ।
कहती   है   कोई   कहानी    देखिए ।।

रायफल   लेकर    खड़े   भूटान   में ।
दिल   यहां    हिन्दोस्तानी    देखिए ।।

अब  पीओके   चाइना  का  हो गया ।
पाक   की   भी  मेहरबानी   देखिए ।।

 लोभियों  के  दंश  में विष  है  बहुत ।
बेटियां   घर    में    सयानी   देखिए ।।

देखना   है  जुर्म   की  तासीर   जो ।
आप   अपनी   राजधानी   देखिए ।।

लोग   इंटरनेट  में  उलझे  है   यहां ।
देश  की   ढहती   जवानी  देखिए ।।

आ  गया  है  क्या  जमाना  दोस्तों ।
 हाँकते   सब    लन्तरानी   देखिए ।।

 सिर्फ अंग्रेजी  में  करते   बात  वो ।
 कुछ गुलामी की  निशानी  देखिए ।।

          नवीन मणि त्रिपाठी
         मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल -- हमें मालूम है इल्ज़ाम तय है

1222 1222 122
तुम्हारी बज्म में  इक  शाम  तय  है ।
फ़िजा में इश्क़  का अंजाम  तय है ।।

सफाई  से  मिलेगा  क्या हमे  अब ।
हमें   मालूम  है  इल्ज़ाम  तय   है ।।

भटकने  की जरूरत  क्या है  यारों ।        फ़ना  के बाद भी  तो धाम  तय है ।।

गरीबों   का    उड़ा  बैठे  हो  चारा ।
तुम्हारे  हक़ में कब आराम  तय है ।।

हमारी  उम्र  का   है  तज्रिबा  यह ।
शराफ़त  में  बड़ा  संग्राम  तय  है ।।

नई  कुर्सी  पे वो  बैठा  है जब  से ।
बताते  लोग  हैं  कोहराम  तय  है ।।

अगर मौला ने बख़्सी  जिंदगी यह ।
हमारे  हाथ  का  भी काम  तय है ।।

वो हाकिम की खुशामद में लगा था।
उसी का आज फिर इनअाम तय है ।।

हथेली  की  लकीरों  को  जरा  पढ ।
मेरी  किस्मत  में  तेरा  नाम  तय है ।।

निभाओगे   कहाँ  तक  साथ  मेरा ।
तुम्हारे  वक्त  का  तो  दाम  तय है ।।

           नवीन मणि त्रिपाठी 
          मौलिक अप्रकाशित

हौसला फिर कोई बड़ा रखिये

2122 1212 22

हौसला  फिर  कोई   बड़ा  रखिये ।
खुद के  होने  की इत्तला  रखिये ।।

बन्द  मत   कीजिये  दरीचों  को ।
इन हवाओं का सिलसिला रखिये ।।

हार   जाएं   न   कोशिशें    मेरी ।
मेरे खातिर भी कुछ दुआ रखिये ।।

खो  न  जाऊं  कहीं  जमाने  में ।
हाल क्या  है  जरा  पता रखिये ।।

दुश्मनी  खूब   कीजिये  लेकिन ।
दिल से जुड़ने का रास्ता रखिये ।।

गर जमाने  के  साथ है  चलना ।
मुज़रिमों से भी वास्ता  रखिये ।।

लोग   मिलते  यहां  नकाबों  में ।
कुछ हक़ीक़त यहां छुपा रखिये ।।

जिंदगी   में   सुकूँ   ज़रूरी    है ।
आसमां सर पे मत उठा रखिये ।।

है शुकूँ  की अगर  तलास बहुत ।
हुक्मरां से  भी लस्तगा  रखिये ।।

काम   बिगड़े  अगर  बनाने  हैं ।
तो खुशामद  का पैतरा  रखिये ।।

हो इजाज़त  तो आप से कह  दूं ।
पास अपने ये  मशबरा  रखिये ।।

बिक  गया  बाप  पढाकर  बेटा ।
काम  के  नाम  घुनघुना रखिये ।।

             नवीन मणि त्रिपाठी
            मौलिक अप्रकाशित

ग़ज़ल - कोई हसरत उफ़ान तक आई

2122 1212 22

बात दिल की  जुबान  तक आई । 
कोई हसरत  उफ़ान  तक आई ।।

मैं  नहीं  बन्द  कर  रहा  कोटा ।
यह  बहस संविधान  तक आई ।।

हौसले  फिर  जले   सवर्णो   के ।
रोशनी  आसमान  तक    आई ।।

फायदा  क्या  मिला  हुकूमत से ।
बस नसीहत लगान तक आयी ।।

मिटती  हस्ती  को  देखता हूँ  मैं ।
आंख जब भी रुझान तक आई ।।

यह  नदी इंतकाम  की  खातिर ।
आज हद के निशान तक आई ।।

हक जो मांगा है,औरतों ने कभी ।
रोज  चर्चा  कुरान  तक   आई ।।

बूंद भर  ही  सही  मगर  स्याही ।
तेरे   झूठे   गुमान   तक  आई ।।

तीर  बेशक  नही  चला लेकिन ।
एक उगली  कमान  तक  आई ।।

फंस गई जाल में वही चिड़िया ।
जो थी लम्बी उड़ान तक आई ।।

जुर्म पकड़ा गया है फिर उसका ।
खोज  ऊंचे  मचान  तक  आई ।।

खूब  बारूद  का   सिला  लेकर ।
कोई  आफ़त मकान  तक आई ।।

          नवीन मणि त्रिपाठी
         मौलिक अप्रकाशित

तेरी आँखों मे

2122  1212  1122  22

है   कोई   तिश्नगी  जरूर   तेरी  आँखों   में |
मीठे   एहसास  का  सरूर  तेरी  आँखों  में ||

जब भी देखा गया ये अक्स किसी दर्पण में ।
बे  अदब  आ  गया , गुरूर   तेरी  आँखों में ||

ख़ास मुश्किल के बाद ही तेरे दर तक पहुँचा ।
कुछ  उमीदें  दिखीं  हैं  दूर  तेरी  आँखों   में ।।

मैं तो  हाज़िर  था  तेरीे एक नज़र पर  साकी ।
बेसबब   क्यो  हुआ  फितूर  तेरी  आँखों  में ।।

जाम छलके नहीं  है आज तलकभी तुझसे ।
है   बड़ा   कीमती   शऊूर   तेरी  आँखों  में ||

मंजिलो की तलाश में ये भटकती  ख्वाहिश ।
देख   ली  जन्नतों  की  हूर   तेरी  आँखों  में ||

हार   बैठे  थे   जिंदगी  के  अंधेरों   से   हम।
मिल  गया  जिंदगी  का  नूर तेरी आँखों  में ||

हो  के  बेचैन  जब  मैं  तुझको  भुलाना चाहा |
फिर दिखा   है  मेरा   कसूर   तेरी  आँखों  में ||

                          नवीन

गुरुवार, 13 जुलाई 2017

ग़ज़ल - जिसने कभी वफ़ा से किनारा नही किया

*221  2121 1221  212*

किस्मत ने उसके साथ करिश्मा नही किया । 
जिसने कभी वफ़ा से  किनारा नहीं  किया ।।

रहना  पड़ा  उसी  के  हरम  में तमाम उम्र ।
जिसने  हमारा  साथ  गवारा  नहीं  किया ।।

कितनी मिली जफ़ा है  मुहब्बत के वास्ते ।
तुमने  कभी  हिसाब पे चर्चा नहीं किया ।।

कानून पास  हो चुके  मुद्दों  के  नाम पर ।
किसने कहा करों में इजाफा नहीं किया ।।

लुटती  है  आबरू  जो  सरेआम  शह्र में ।
कहते हैं लोग हुस्न पे परदा  नहीं  किया ।।

शायद कोई ख़ता हुई जबसे नज़र मिली।
उसने  इधर निगाह  दुबारा  नहीं  किया ।।

इफ़्लास का हमारे जब उसको पता चला ।
तब  से  वो  ऐतबार  हमारा  नहीं  किया ।।

कुछ  तो  सहा  है  दर्द  जरा मानिए हुजूर ।
शब भर दुआ के साथ गुजारा नहीं किया ।।

कितना  बदल  गया है यहां आम आदमी ।
इज्ज़त  गई  तो  शोर शराबा नहीं किया ।।

         --नवीन मणि त्रिपाठी
         मौलिक अप्रकाशित 
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ग़ज़ल -- दर्द गहरा था

2122 1122 1122 22(112)
दर्द गहरा  था मगर  हद  से  गुज़रने  न  दिया ।
अश्क़ हमने भी कभी आंख  में आने  न दिया ।।

आसमा   में  वो  परिंदे  ही  सफ़र  करते  हैं ।
जिन परिंदों ने कभी पर को कतरने न दिया ।।

आज खामोश हैं घुघरू जो खनकते थे कभी ।
वक्त  बेचैन  से  पावों  को  थिरकने  न दिया ।।

ख्वाहिशें  खूब  जवाँ  थी   किसी  मैखाने  में ।
मेरे   मौला  ने   मुझे  रात  बहकने  न   दिया ।।

मैंने  तूफान   में   चेहरे   पे   सिकन  देखा  है ।
उन  हवाओं  ने  कभी  जुल्फ सँवरने न दिया ।।

उंगलिया  लोग  उठाते  हैं  उसी  पर  अक्सर ।
जिंदगी भर जो कदम घर से बहकने न दिया ।।

यह  हक़ीक़त   है  खरीदार  बहुत  थे   उनके ।
यूँ  तिज़ारत में  कभी भाव को गिरने न दिया ।।

जीत  सकते  थे  मुहब्बत की ये बाजी शायद ।
एक  सिक्का  भी मेरे नाम  उछलने न  दिया ।।

क़द्र क्या है ये हिफ़ाज़त के उसूलों से मिला ।
मेरे  साकी  ने  कहीं जाम छलकने न  दिया ।।

            ----नवीन मणि त्रिपाठी 
             मौलिक अप्रकाशित 
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ग़ज़ल - हमारे इश्क़ की तहरीर

1222 1222 1222 1222
हमारे  इश्क की  तहरीर  गर मंजूर  हो  जाये ।

हमारे जख्म का  हर दर्द भी काफूर हो जाये ।।


दुपट्टे को हवा में यूं उड़ाकर क्या मिला तुझको ।

मुझे डर है  न दीवाना  कहीं  मशहूर  हो जाये ।।


अना के साथ उसके हुस्न की होती नुमाइश है ।

कहीं ऐसा न्  हो  तारीफ से  मगरूर हो जाये ।।


मुहब्बत रोज जिंदाबाद हो अहले चमन में अब ।

तुम्हारे शहर का भी  कुछ  नया दस्तूर हो जाये ।।


मुकम्मल हो तबस्सुम का नज़ारा इन फिजाओं में ।

कोई  सूखा  हुआ चेहरा भी अब अंगूर  हो  जाये ।।


तुम्हारी इस तरक्की से बहुत  डरने  लगा  है वो ।

 न हक से  बेदखल  कोई  यहां  मजदूर हो जाए ।।

बुधवार, 12 जुलाई 2017

ग़ज़ल - मौत के जश्न पे सम्वाद करेगी दुनिया

*2122  1122  1122  22*
इस   तरह   अम्न  को   बर्बाद   करेगी   दुनिया ।
फिर   नए   जुर्म   को   ईजाद  करेगी  दुनिया ।।

छीन   लेती   है  निवाले   भी   मेरे   बच्चों  से ।

कब  तलक  कर्ज  से आज़ाद  करेगी  दुनियां ।।

जब भी मकसद का शजर बनके नज़र आऊंगा।

मेरी   ताक़ीद   पे    फरियाद   करेगी  दुनिया ।।

रोज   उठता   है  धुंआ   एक  कहानी  लेकर ।

क्या  बताऊँ  की  किसे  याद करेगी  दुनिया ।।

है  सराफ़त से  तेरी  बज्म  में जीना मुश्किल ।

साफ  दामन  पे  बहुत  शाद  करेगी दुनिया ।।

कत्ल  करने  का सलीका भी अजब है यारों ।

हर  सही  बात  पे  अपवाद  करेगी  दुनिया ।।

मुफ़लिसी देख  के अपने भी  मुकर जाते  हैं ।

कौन  कहता  है कि  इमदाद करेगी  दुनिया ।।

जख्म देकर के वो मरहम की खबर रखती है ।

लूटकर  घर  मेरा   आबाद   करेगी   दुनिया ।।

नव  निहालों  की  हथेली  में  है बारूद बहुत ।

अब  तो मासूम  को जल्लाद  करेगी दुनिया ।।

रोज  ऐटम  की  नयी   खेप   बना  देती   है  ।

मौत  के जश्न   पे  सम्वाद   करेगी   दुनिया ।।

          नवीन मणि त्रिपाठी 

        मौलिक अप्रकाशित 
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